गोस्वामी तुलसीदास जी ने सदियों पहले लिख दिया था — "समरथ के नहीं दोष गोसाई." त्रेता युग में राम थे, द्वापर में कृष्ण. और कलियुग में सरकार है. अब सरकार कोई साधारण संस्था नहीं, यह एक चमत्कारी सत्ता है. जो चाह ले तो जनता से थाली ताली बजवा सकती है, दीया जलवा सकती है, मोबाइल की टॉर्च से कोरोना को डरवा सकती है. यह वही सरकार है जो भ्रष्टाचारियों को सत्य हरिशचंद्र बना सकती है और सच बोलने वालों को कालकोठरी में तपस्या का अवसर प्रदान करती है. और यदि सरकार डबल इंजन वाली हो तो फिर वहां कथित रुप से राम राज्य होने की बात कही जाती है. डबल इंजन वाली सरकार में ना खाता ना बही जिधर बुलडोजर चल जाए वही सही. वहां पीड़ितों को न्याय मिले या मिले लेकिन सरकार के खिलाफ बोलने वालो को पुलिस प्रशासन द्वारा निश्चित रुप से पुरस्कृत किया जाता है और पुरस्कार इतना जबर्दस्त मिलता है कि पुरस्कार पाने .वालो के आने वाली सात पीढ़ीयां फिर कभी सपने में भी सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे. अपराधी, वर्तमान समय में बलात्कारी, भ्रष्टाचारी और कलंकी नेता ही कलयुग का कलिंक अवतार माना जाता है.
समर्थता का नया परिभाषा
सब साधन संपन्न सरकार समर्थवान है क्योंकि उसके पास जनता की याददाश्त से तेज़ वाइपिंग पावर है. सरकार समर्थ है क्योंकि वह सवालों को देशद्रोह में बदलने की योग्यता रखती है. वह सवाल को ही झूठा साबित कर उसको खारिज कर देती है. सरकार समर्थ है क्योंकि वह विकास की परिभाषा को रील्स और रैप में बदल चुकी है. अब दोष किसका है? दोष उनका है जो सरकार से सवाल पूछते हैं. दोषी वो हैं जो कहते हैं कि "बेरोजगारी बढ़ रही है", "महंगाई चरम पर है", "लोकतंत्र सिकुड़ रहा है". अरे भाई आप क्यों नहीं समझते है कि सरकार से सवाल पूछना मतलब राष्ट्र से सवाल पूछना क्योंकि सरकार ने यह सिद्ध कर दिया है कि वही राष्ट्र है, और राष्ट्र से सवाल पूछना मतलब राष्ट्रविरोध.
आत्मनिर्भरता का नया स्वरुप
सरकार ने कहा — "आत्मनिर्भर बनो." तो जनता ने पकोड़े तले, रील्स बनाए, और कुछ ने तो जेल की रोटियों में भी आत्मनिर्भरता खोज ली. अब सरकार ने जनता पर भरोसा नहीं करते हुए स्वंय को आत्मनिर्भर बनाने की राह ढ़ूढ़ निकाली है. सरकार ने इस आत्मनिर्भर प्लान पर काम करना शुरु भी कर दिया है. सरकार ने जनता के वोट को अपने नाम करने का अनोखा तरीका है. इसमें जोखिम बिलकुल भी नहीं सही रहा तो सरकार के पक्ष में और अगर चोरी पकड़ी गई तो संवैधानिंक संस्था की जिम्मेवारी यह प्लान रंग भी ला रहा है. आप सरकार से उम्मीद क्यों करते हैं? क्या सरकार ने सबका ठेका ले रखा है? क्या आपको हर बार बताना पड़ेगा कि सरकार का काम सिर्फ चुनाव जीतना और सरकार चलाना है जनकल्याण करना नहीं?
लोकतंत्र का नया रंगमंच
संसद अब बहस का नहीं, बहिष्कार का मंच बन चुकी है. मीडिया अब सवाल नहीं पूछता, सरकार की चालीसा गाता है. न्यायपालिका अब न्याय नहीं देती, टिप्पणी से काम चला लेती है. और जनता? जनता अब मेमोरी कार्ड की तरह है. जब तक फॉर्मेट नहीं होती, तब तक पुराने सवालों को याद करती रहती है. इसलिए हे गोसाई, हे भक्तगण, हे आत्मनिर्भर नागरिकों — दोष मत ढूंढो, सवाल मत पूछो, थाली बजाओ, दीया जलाओ, रील बनाओ, सरकार से मिलने वाली रेवड़ीयों का आनंद लीजिए और सरकार को समरथ मानकर उसकी हर लीला को रामलीला समझकर जयकारा लगाइए. क्योंकि — "समरथ सरकार के नहीं दोष गोसाई!" तो प्रेम से समरथ सरकार की जय बोलिए. जय हो.
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