वर्तमान परिपेक्ष्य में भारतीय राजनीति का मंच अब सिर्फ भाषणों का नहीं बल्कि यह एक रंगमंच बन गया है, जहां नेता जी कभी भावुकता का भरतनाट्यम करते हैं, कभी वादों की कथकली, और कभी-कभी तो विरोधियों पर आरोपों की ब्रेक डांस भी कर डालते हैं. चुनावी मौसम आते ही देश के हर कोने में "नेता नृत्य महोत्सव" शुरू हो जाता है जहां टिकट फ्री और ड्रामा गारंटीड. डांस दिखाओ वोटर रिझाओ के इस महाकुंभ में फ्री में जनता का भरपूर मनोरंजन होता है.
लोकतंत्र में नाच के प्रकार
वैसे तो भारतीय शास्त्रीय संगीत में नृत्य का महत्वपूर्ण स्थान है. नृत्य के कई प्रकार भी हैं. लेकिन भारतीय राजनीति में नाच व नृत्य की बात ही कुछ और है. राजनीति में नाच कई प्रकार के होते हैं, जिनका कोई शास्त्रीय वर्गीकरण तो नहीं हैं. लेकिन वह जनभावनाओं में गहराई से पैठ बना चुके हैं. बात अगर राजनीति नृत्य की करें तो पहले नंबर पर वोट-लुभावन तांडव नृत्य आता है. इसमें नेता जी विकास की ऐसी झड़ी लगाते हैं कि जनता को लगता है, बस अब रामराज्य आने ही वाला है. सड़क, बिजली, पानी सब वादों की ताल पर थिरकते हैं. वहीं दूसरा नंबर आरोप-प्रत्यारोप गरबा का है. इसमें एक पार्टी आरोप लगाती है, दूसरी उसका जवाब देती है, फिर दोनों मिलकर मीडिया के कैमरे के सामने ऐसा गरबा करते हैं कि टीआरपी की घंटी बज उठती है. तीसरा नंबर दल-बदल भांगड़ा का है. चुनाव से पहले नेता जी जिस पार्टी में होते हैं, चुनावी हवा बदलते ही दूसरे दल में कूद पड़ते हैं. यह नाच बिना संगीत के होता है, लेकिन ताल हमेशा सत्ता की होती है. वहीं जब कोई नेता अपने पुराने बयानों से पलटी मारता है, तो वह संविधान की व्याख्या करते हुए संविधानिक कथक करता है तो कुछ देर के लिए ही सही जनता भी भ्रमित हो जाती है.
टेढ़ा आंगन या नाच नकली?
नेता जी कहते हैं कि "हम तो सच्चे हैं, नाचना नहीं आता, आंगन ही टेढ़ा है." लेकिन जनता जानती है कि यह आंगन टेढ़ा नहीं, तेजाबी है, जहां हर कदम फिसलन भरा है. हकिकत यह है कि नाचने वाले को पता है कि कैमरा कहां है, तालियां कब बजेंगी, और कब मंच से उतरकर फिर से जनता के बीच "सेवा" का अभिनय करना है, कब आंसू बहाना है और कब गीत गुनगुनाना है.
नाच का नया रंगमंच
सोशल मीडिया के इस दौर में अब तो नेता जी का हर स्टेप वायरल होता है. कोई मंच पर गाना गा रहा है, कोई डांस कर रहा है, कोई बच्चों को गोद में उठाकर वोट मांग रहा है. जनता भी कम नहीं मीम्स, रील्स और व्यंग्यात्मक ट्वीट्स व कमेंट्स की बौछार से नेता जी का "नाच" ट्रेंडिंग में बना रहता है. राजनीति का यह नाच कभी-कभी मनोरंजन देता है, तो कभी चिंता भी. लेकिन जब जनता सजग होती है, तब यह नाच एक जन-जागरण बन जाता है. नेता जी चाहे जितना भी कहें "नाच ना आवे, आंगन टेढ़ा." जनता सब जानती है कि नेताओं को नाच भी आता है, और आंगन भी सीधा है, बस उनकी नीयत ही टेढ़ी है.
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