जब आसमान बिलकुल साफ नीला हो और बिन बादल वादों की बारिश हो तो यकिन मानिए वह चुनावी मौसम आगाज़ है. चुनावी मौसम में अक्सर लगातार वादों की बारिश होती रहती है. यह वो बारिश है जिसमें जनता भींगती नहीं है बल्कि वादों कि बारिश की बूंदें कानों के रास्ते दिल तक पहुंच कर गुदगुदी करती हैं, और दिमाग में भ्रम पैदा करती हैं. यह चुनावी मौसम का असर है इसका कोई इलाज नहीं है.
वादों का मानसून
हर पांच साल में लोकतंत्र के आंगन में एक विशेष प्रकार का मानसून आता है, जिसमें माननीय नेतागण बादलों की तरह गरजते हैं, बिजली की तरह चमकते हैं, और फिर वादों की बौछार करते हैं. इस खुशनुमा चुनावी मौसम की बारिश का अपना ही आनंद है. माननीय लोग वादों की झड़ी लगा देते है और बेचारी जनता इस वादों की बारिश को हमेशा की तरह झेलती है. उसे पता है कि यह चुनावी मौसम की बादों की बारिश से ना तो “हर हाथ को काम मिलता है,” ना ही “हर खेत को पानी,” ना ही “हर जेब में पैसा और हर घर में वाई फाई,” और इतने वर्षों में ना ही “भ्रष्टाचार खत्म हो पाया और ना ही समाज के अंतिम पायदान पर खड़े आम नागरिकों का ही विकास हुआ.” जनता भी इस मौसम की अनुभवी है. वो जानती है कि माननीयों द्वारा आयोजित ये वादों की नकली बारिश दरअसल जनकल्याण के लिए अपितु लोगों को दिगभ्रमित करने के लिए की जाती है.
चुनावी कैटवॉक
चुनाव मौसम में माननीय नेताओं के फैशन परेड के क्या कहने हैं. माननीय लोग ऐसे सज-धज कर निकलते हैं जैसे हर ओर फैशन शो हो रहा हो. कोई टोपी बदलता है, कोई रंग तो कोई पार्टी ही बदल देता है. भाषणों में "गरीबों का मसीहा" बनने की होड़ लग जाती है. और जनता? वो हर बार उम्मीद करती है कि “इस बार शायद सचमुच कुछ बदले,” बदलाव तो होता है लेकिन सिर्फ नारों में. अफसोस जनता हर बार छली जाती है. यही लोकतंत्र कि विशेषता है कि जिसके दम पर लोकतंत्र जीवित है उसी लोकतंत्र में तंत्र हमेशा लोक पर हावी रहता है.
वादों की प्रयोगशाला
नेताओं के पास एक गुप्त लैब होती है, जहां काफी जांच परख के बाद वादों को तैयार किया जाता है. वहां से निकलते हैं. त्वरित विकास के कैप्सूल, मुफ़्तख़ोरी बम व मुफ्त की रेवड़ी योजनाएं, धर्मनिरपेक्ष सिरप और राष्ट्रवाद का नूडल्स . इनका सेवन करने से जनता को कुछ समय के लिए लोकतंत्र का स्वाद आता है, लेकिन बाद में पेट में मरोड़ और पछतावा होता है.
जनता का जादू
फिर भी, सबसे बड़ा वोट का जादू जनता के पास होता है. वो चाहे तो राजा को रंक बना दे, और रंक को राजा. लेकिन अक्सर वो जादू या तो जाति में उलझ जाता है, या जुमलों में फंस कर रह जाता हैं. चुनावी मौसम में वादों की बारिश का आनंद वही ले सकता है जो जानता है कि ये बारिश नहीं, बर्फबारी है. जो ऊपर से मुलायम लगती है, लेकिन नीचे सब कुछ जमा देती है. इस बार भी चुनावी मौसम आया है. वादों की बौछार शुरू है. छाता मत निकालिए, नज़रें तेज कीजिए. क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत वादों को परखने में है, न कि उनमें भीगने में. तो चुनावी मौसम का आंनद लीजिए और मस्त रहिए.
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