पूछ रहा है देश का युवा: पेपर लीक का जिम्मेदार कौन?--धर्मेंद्र कुमार


भारत के लोकतंत्र में आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि लगातार हो रहे पेपर लीक का जिम्मेदार कौन है? 6 जून, शनिवार को दिल्ली के जंतर मंतर पर देशभर से आए युवाओं ने यही सवाल सीधे सरकार से पूछा। लेकिन सरकार के पास इस सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं था। शायद इसलिए कि इस पूरे खेल में शामिल लोगों को बचाने की कोशिश हो रही है।
युवाओं का आक्रोश
भारत की आबादी का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा युवा है। यही युवा अपने भविष्य और अधिकारों को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। परीक्षा घोटाले, पेपर लीक और भर्ती प्रक्रिया में धांधली ने उनके सपनों को चकनाचूर कर दिया है। कहने को तो युवा देश उज्जवल भविष्य होता है। लेकिन जब युवाओं का भविष्य ही अंधकारमय हो और सरकार असंवेदनशील हो तो देश का भविष्य क्या होगा ?  
सरकार की चुप्पी और संवेदनहीनता
केंद्र की भाजपा सरकार युवाओं के भरोसे लगातार चुनाव जीत रही है, लेकिन युवाओं के सवालों पर मौन है। सरकार का मानना है कि यदि जनता इतनी परेशान है तो फिर चुनावों में जीत कैसे मिल रही है? बड़ा सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र का पैमाना केवल चुनाव जीतना ही रह गया है? यह ऐसा सवाल जिसपर देश की जनता को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
लोकतंत्र और जवाबदेही
आज लोकतंत्र केवल आकड़ों और चुनावी जीत तक सीमित होकर रह गया है। जबकि लोकतंत्र का असली अर्थ है तो जनता के प्रति जवाबदेही है, क्योंकि लोकतंत्र में जनता ही मालिक होती है। लेकिन हाल के दिनों में परिदृश्य बदल गए हैं। अब जनता सरकार के रहमो कर्म के भरोसे है। मतलब अब सरकार व चुनाव आयोग तय करेगा कि आप सरकार को चुनने के लायक वोटर हैं भी या नहीं  ?
लोकतंत्र में सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। जब युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ हो रहा है, तो सरकार की जिम्मेदारी है कि वह दोषियों को बेनकाब करे और उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करे। लेकिन यदि सरकार ही दोषियों को बचाने में लगी है, तो यह लोकतंत्र की आत्मा के साथ विश्वासघात है।
जनता का निर्णय
अब यह सवाल जनता के सामने है कि क्या हम केवल चुनावी जीत को ही लोकतंत्र मानेंगे? या फिर हम एक ऐसी व्यवस्था चाहेंगे जिसमें युवाओं के अधिकार सुरक्षित हों और उनके सपनों को कुचला न जाए? पेपर लीक केवल परीक्षा का संकट नहीं है, यह लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर सीधा हमला है। युवाओं का आक्रोश इस बात का संकेत है कि अब जनता को निर्णय लेना होगा। क्या हम इस निर्लज्ज और असंवेदनशील व्यवस्था को स्वीकार करेंगे या एक नई जवाबदेह राजनीति की मांग करेंगे। यह आंदोलन केवल सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सड़े-गले सिस्टम के खिलाफ है जिसने युवाओं को बार-बार धोखा दिया है

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