*भरत तिवारी की हत्या या इनकाउंटर: कौन है जिम्मेदार? -धर्मेंद्र कुमार*
भरत तिवारी की हत्या या इनकाउंटर: कौन है जिम्मेदार?
-धर्मेंद्र कुमार
बिहार के भोजपुर ज़िले के शाहाबाद क्षेत्र के बिलौटी गांव के युवक भरत तिवारी की हालिया कथित पुलिस मुठभेड़ (इनकाउंटर) में हुई मौत ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया है। स्थानीय जनता सड़कों पर उतरकर विरोध कर रही है और पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की मांग कर रही है। लोगों का यह आक्रोश केवल भरत तिवारी की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था पर घटते भरोसे का प्रतीक है। लोग पूछ रहे हैं कि जब अदालतें और कानून मौजूद हैं, तो पुलिस को "न्यायाधीश" बनने का अधिकार किसने दिया।
इस बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने न्यायिक जांच का आदेश दिया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या बिहार या पूरे देश में, पुलिस को ‘न्याय का ठेकेदार’ बनने की छूट कब तक मिलती रहेगी? लोकतंत्र में गोली के बदले गोली का कोई स्थान नहीं है, बल्कि हर प्रकार की समस्याओं के समाधान के लिए न्याय व्यवस्था का प्रावधान है। यह भी सही है कि देश में न्याय प्रक्रिया धीमी है, महंगी है और थकाने वाली है। लेकिन न्याय व्यवस्था के विकल्प के तौर पर एवं ‘त्वरित न्याय के नाम पर इनकाउंटर करना लोकतंत्र के लिए जहर है।
पुलिस की भूमिका और सवाल
भरत तिवारी कथित इनकाउंटर में पुलिस का कहना है कि उनके द्वारा आत्म रक्षार्थ गोली चलाई गई थी, जिसमें भरत तिवारी गंभीर रुप से घायल हो गया था। जिसकी ईलाज के दौरान मौत हो गई। पुलिस के अनुसार यह एक "इनकाउंटर" था। लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों, ग्रामीणों और परिजनों का आरोप है कि यह सुनियोजित हत्या है। उनका कहना है कि भरत तिवारी द्वारा आत्मसमर्पण करने के बाद पुलिस ने उसे गोली मारी। सोशल मीडिया पर भरत तिवारी का जो वीडियों वायरल हो रहा है। उसमें तो साफ दिख रहा है कि भरत तिवारी ने पुलिस के सामने हथियार फेंक दिया था। हालांकि यह सब जांच का विषय है औऱ न्यायिक जांच में सब कुछ सामने आ जाएगा। लेकिन यदि पुलिस अपराधियों को सीधे गोली से जवाब देने लगे, तो यह कानून के शासन पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि इनकाउंटर न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता।
सरकार और न्यायपालिका की स्थिति
मुख्यमंत्री द्वारा न्यायिक जांच का आदेश देना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन जनता का विश्वास तभी लौटेगा जब जांच निष्पक्ष और पारदर्शी हो और भरत तिवारी को न्याय मिले। सवाल यह भी है कि क्या सरकार अब अपराधियों को उनकी भाषा में ही जवाब देने की नीति अपना रही है। यदि ऐसा है, तो यह लोकतंत्र और न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका को कमजोर करता है। भारत में इनकाउंटर संस्कृति नई नहीं है। कई राज्यों में यह "तेज़ न्याय" के नाम पर अपनाई गई है। लेकिन हर बार यह सवाल उठता है कि क्या यह वास्तव में न्याय है या केवल राजनीतिक और प्रशासनिक सुविधा।
भरत तिवारी की हत्या या इनकाउंटर का जिम्मेवार कौन?
भरत तिवारी की हत्या हुई या इनकाउंटर सवाल यह नहीं है। सवाल यह है कि इसके लिए जिम्मेवार कौन लोग हैं? सवाल यह है कि आखिर भरत तिवारी को क्यों हथियार उठाना पड़ा? इस पूरे मामले में सरकारी सिस्टम व व्यवस्था के साथ ही पूरा समाज दोषी है। आज जो लोग भरत तिवारी को न्याय दिलाने की बात कह रहे है। वे लोग तब कहां थे? जब भरत तिवारी जवनियां गांव के लोगों की लड़ाई अकेले लड़ रहा था। वह मीडिया कहां थी? जो आज भरत तिवारी कथित हत्या और इनकाउंटर पर लगातार बहस कर रही हैं और रोज नित नए खुलासे की बात कर रही है। और सबसे ज्यादा दोषी वह समाज के लोग हैं जो आज भरत तिवारी को न्याय दिलाने के लिए सड़क पर उतर कर पुलिसिया कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं। यदि समाज के लोग भरत तिवारी का साथ दिए होते तो इस घटना की नौबत ही नहीं आती। लेकिन समाज के लिए भरत अकेले ही लड़ते हुए इस भ्रष्ट सिस्टम का शिकार हो गया। भरत तिवारी पूरी भ्रष्ट सिस्टम के लिए सरदर्द बन गया था। यही हकिकत है। हर साल बिहार में बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा के करोड़ों का सरकारी फंड ग्रामीणों के सहायता के लिए आता है। जिसका कोई ऑडिट नहीं होता है। इस पूरे खेल में सबका बराबर का हिस्सा होता है और भरत तिवारी इस फंड का सदुपयोग जवनियां गांव के लोगों विकास के लिए कराने की जिद पर अड़ा था। जो उसके अंत का बड़ा कारण बना।
भरत तिवारी की मौत केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह कानून और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गहरी चोट है। लोकतंत्र में न्यायालय ही अंतिम निर्णायक है। यदि पुलिस और सरकार इस प्रक्रिया को दरकिनार करती हैं, तो यह लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। क्या हम लोकतंत्र को पुलिस की बंदूक के हवाले कर देंगे, या न्यायपालिका और समाज मिलकर इसे बचाएंगे?
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