*राम धन की लूट है या ईश्वरीय कृपा ? -धर्मेंद्र कुमार*

राम धन की लूट है या ईश्वरीय कृपा ?
        -धर्मेंद्र कुमार

संत कबीर ने लगभग 500 वर्ष पहले ही कहा था कि राम नाम की लूट मची है जो चाहे जिस रुप में लूट सके तो लूट ले क्योंकि यह लूट की अवधि सीमित समय के लिए ही है। कबीर को शायद आभास था कि पांच सौ साल बाद जब रामलला अयोध्या में विराजमान होंगे, तो उनके ही दरबार में उनके ही नाम पर लूट मचेगी। फर्क बस इतना है कि तब लूट आस्था की थी, आज लूट नकदी और चढ़ावे की है। वहीं मीराबाई ने अपनी रचना के माध्यम से यह स्वीकार किया कि पायो जी मैंने राम रत्न धन पायो। जबकि आधुनिक गीतकार राजेंद्र कृष्ण ने कलयुग का चित्रण करते हुए क्या खूब लिखा कि रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा जहां हंस को दाना चुगना पड़ेगा और कौवा मोती खाएगा। जहां धर्म भी होगा और कर्म भी होगा लेकिन शर्म नहीं होगा। यह गीतकारों और कवियों की कोरी कल्पना नहीं बल्कि उनके लिखे गीत आज अक्षरसः सही सिद्ध हो रहे हैं। अयोध्या में स्थित राम मंदिर जहां रामलला विराजमान हैं। वहां के सेवक ही राम दरबार की चढ़ावे को लेकर चंपत हो गए। उधर राम भजन में मस्त औऱ व्यस्त मंदिर प्रबंधन समिति को इसका भान ही नहीं।  

राम नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण है दाम

आधुनिकता के इस युग में राम नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण भक्तों की जेब में दाम यानि रुपया होना जरुरी है। आज भक्तों कि आस्था और भक्ति की पहचान उनके चढ़ावे की चमक से आंकी जाती है। पूजा सामग्री और प्रसाद की मिठास से नहीं। भगवान भी आज कल बीआईपी दर्शन देने में विश्वास करते है क्योंकिं आम आदमी उनके लिए क्या ही दान कर पाएगा। और बिना दान के भगवान भी अपने भक्तों का कैसे कल्याण कर पाएंगे। भगवान नहीं चाहते हैं कि भीषण गर्मी में उनके दरबार में भक्तों को ध्यान व पूजा पाठ करने में परेशानी हौ। इसलिए अब प्रतिष्ठित मंदिरों को वातानुकुलित बनाने की पंरपरा की शुरुआत हो गई। भक्तों का मानना है कि यह सब कुछ ईश्वर के आदेश के बिना संभव ही नहीं है। कहने को तो भगवान के दरबार में सभी समान है लेकिन भगवान भी भक्तों की भक्ति व आस्था से ज्यादा चढ़ावे की चमक और प्रसाद की मिठास एवं गुणवत्ता देखकर आपनी कृपा बरसाते है। अब वो तो भगवान ही है उनकी मर्जी के आगे सेवकों का क्या ही जोर चलता है। क्योंकि भगवान को भोग तो सेवक ही लगाते है।

 राम नाम के ठेकेदार और उनकी निर्लज्जता

राम के नाम पर मांगकर जीने वालों और लूट मचाने वालों को काहे की शर्म भाई। उन्हें तो डायरेक्ट भगवान ने ही लाइसेंस थमा दिया है कि राम नाम जपना और राम दरबार के चढ़ावे को समझना अपना। जो लोग भगवान श्रीराम को लाए उन्हें अयोध्या में विराजमान किए। भगवान को लाने और स्थापित करने में जो उन्होंने खून-पसीना बहाया उसकी मजदूरी तो बनती है न? ऐसे में विपक्ष के पेट में मरोड़ क्यों उठ रहा है भाई। जब हम सुबह शाम यह गाते है कि अंधों को आंख देत कोढ़ियन को काया बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया। तो इस डिजिटल युग में जब राम जी अपने सेवकों व भक्तों पर प्रसन्न होकर उनके खाते में करोड़ों रुपए डाल रहे है, तो काहे की परेशानी है भाई। आखिर निर्धन भक्तों को भगवान कल्याण कैसे करेंगे। यदि किसी भक्त के खाते में अचानक से करोडों आ जाते हैं तो इसे ईश्वरीय कृपा क्यों ना समझा जाए। सवाल यह है कि आखिर भगवान अपने निर्धन भक्तों को कैसे माया प्रदान करेंगे? आपने अक्सर भक्तों से यह कहते सुना होगा कि रात स्वप्न में भगवान आए और आदेश दिया कि मंदिर में इतना दान दे दो या फिर मंदिर बनवा दो। लेकिन आपने कभी भक्तों को यह कहते नहीं सुना भगवान किसी के स्वप्न में आकर यह कह गए कि अमुक गांव के अमुक परिवार बहुत परेशान है जाओ जाकर उनकी मदद करो। यह अध्यात्मिक विमर्श का विषय हो सकता है कि क्या कलयुग में भगवान भी स्वार्थी हो गए हैं ? लेकिन आपकी आस्था दान देने और लेने में बनी रहनी चाहिए।

Comments

Popular posts from this blog

पूर्वी सिंहभूम कांग्रेस में बगावत के सुर: कार्यकर्ता बोले, नहीं चलेगा मनमाना फैसला

जूता की गाथा: जूता बढ़ाए मान, जूता से हो अपमान धर्मेंद्र कुमार

वैज्ञानिकों का सामूहिक इस्तीफा और सरकार की नियत पर सवाल-- धर्मेंद्र कुमार