“विधायक/सांसद भी इंसान हैं भाई!”-धर्मेंद्र कुमार
जनता नेताओं को चुनती है, उन्हें पलकों पर बिठाती है ताकि वे संसद में उनकी आवाज़ उठाएं। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि चुनाव जीतने के बाद यदि नेता निकुंश हो जाए तो जनता को पाँच साल तक इंतज़ार करना पड़ता है। जब कोई विधायक या सांसद अपनी जनता को भूलकर अपने या अपनों को याद कर लेता है, तो मीडिया और विपक्ष ऐसे बवाल मचाते हैं जैसे संसद भवन में चाय की जगह नींबू पानी परोस दिया गया हो। लेकिन जरा ठहरिए विधायक व सांसद भी तो इंसान ही हैं। इंसान की सबसे बड़ी खासियत है कि उसकी अंतरआत्मा समय–समय पर जाग जाती है। कभी चुनाव के वक्त, कभी वोटिंग के वक्त, और कभी–कभी तो राज्यसभा चुनाव के वक्त भी। और जब अंतरआत्मा जागती है, तो वह पुकारती है— “जाओ बेटा, आज पार्टी लाइन से हटकर मन की करो।”
तो बेचारे विधायक क्या करें? अपनी अंतरआत्मा की आवाज़ दबाएं? नहीं! वे वही करते हैं जो हर इंसान करता है—मन की सुनते हैं। जब देश के प्रधानमंत्री मन की बात करते है, तो विधायकों व सांसदों को मन की बात सुनना ही चाहिए। मन की सुनने के बाद वे कभी–कभी गलती से दूसरे दल के आंगन में टहल आते हैं। इसे गद्दारी कहना गलत है। यह तो बस आत्मा की सैर है।
जिंदगी चार दिन की है। दो आरज़ू में बीत गए और दो इंतज़ार में बीत जाएंगे। इसलिए मन की सुननी और माननी भी चाहिए। तो फिर विधायक अगर अपनी अंतरआत्मा की सुन लें, तो इसमें हंगामा क्यों?
राजनीति में अंतरआत्मा की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है। यही वह अदृश्य शक्ति है जो नेताओं को अचानक पार्टी व्हिप भूलने पर मजबूर कर देती है। और फिर परिणाम चाहे कुछ भी हो, विधायक को तो मानसिक शांति और आत्मिक तृप्ति मिल ही जाती है।
जनता को समझना होगा कि विधायक कोई रोबोट नहीं हैं। वे भी कभी–कभी सिस्टम अपडेट के दौरान रीस्टार्ट हो जाते हैं। और जब रीस्टार्ट होते हैं, तो नई दिशा में चल पड़ते हैं।
तो अगली बार जब कोई विधायक या सांसद अपनी अंतरआत्मा की पुकार पर दूसरे दल के आंगन में टहलता दिखे, तो इसे दल बदल मत कहिए। इसे कहिए— “अंतरआत्मा का वॉकिंग टूर।” क्योंकि आखिरकार, विधायक सांसद भी इंसान हैं भाई!
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