चुनाव आयोग की निष्पक्षता बनाम लोकतंत्र की प्रासांगिकता --धर्मेंद्र कुमार

संदर्भः- राज्यसभा चुनाव 2026
 

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया में जनता की सामूहिक भागीदारी है। संविधान ने चुनाव आयोग को वह संवैधानिक अधिकार दिए हैं जिनका उद्देश्य जनता के मताधिकार की रक्षा करना और चुनावों को निष्पक्ष व पारदर्शी बनाना है। लेकिन हाल के वर्षों में आयोग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं, जो लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं हैं।
बंगाल और बिहार में एसआईआर विवाद
पश्चिम बंगाल में एसआईआर के नाम पर लगभग 27 लाख लोगों को मतदान से वंचित कर दिया गया। यह भारतीय चुनावी इतिहास में अभूतपूर्व घटना है। इससे पहले बिहार में भी इसी प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई थी। विपक्ष का आरोप है कि यह कदम जनता के अधिकारों को सुरक्षित रखने के बजाय सत्ता पक्ष को लाभ पहुंचाने के लिए उठाया गया।

राज्यसभा चुनावों में दोहरे मापदंड

मध्यप्रदेश और झारखंड में पांच सीटों के लिए होने वाले राज्यसभा चुनावों में आयोग के निर्णय से उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े हो गए हैं। एक ही तरह के मामले में जहां मध्यप्रदेश में कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन प्रथम दृष्टया रद्द कर दिया गया, वहीं झारखंड में बीजेपी समर्थित उम्मीदवार परिमल नाथवाणी को नामांकन पर्चा में सुधार करने के लिए समय दिया गया और त्रुटि सुधार के साध ही उनके नामांकन को वैद्ध घोषित कर दिया गया। यहां महत्वपूर्ण सवाल यह है कि एक ही तरह के मामले के लिए अलग अलग निर्णय किस आधार पर लिया गया ? चुनाव आयोग का यह दोहरा मापदंड उसकी विश्वसनीयता को कमजोर करता है, जो लोकतंत्र की मूल भावना पर चोट करता है।
विपक्ष की मुखरता और आयोग की चुप्पी
विपक्ष लगातार इन मुद्दों पर सवाल उठा रहा है, लेकिन आयोग विपक्ष के प्रश्नों का उत्तर देने से बचता दिख रहा है। क्योंकि उसके पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं। लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य है। यदि संवैधानिक संस्थाएं ही अपनी जिम्मेवारी और जवाबदेही से मुंह मोड़ ले तो लोकतंत्र का आधार ही हिल जाता है।
लोकतंत्र की प्रासांगिकता पर प्रश्न
लोकतंत्र तभी प्रासंगिक है जब हर नागरिक को समान अधिकार मिले और चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष हो। यदि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर ही संदेह हो जाए, तो लोकतंत्र केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा। आयोग को यह समझना होगा कि उसकी भूमिका किसी सरकार के पक्ष में माहौल बनाने की नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों की रक्षा करने की है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ है। यदि यह संस्थान पक्षपातपूर्ण दिखे, तो लोकतंत्र की प्रासांगिकता पर गहरा संकट खड़ा हो जाएगा। आयोग को चाहिए कि वह अपने निर्णयों में पारदर्शिता और समानता सुनिश्चित करे, ताकि जनता का विश्वास कायम रहे और लोकतंत्र जीवंत बना रहे।

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