अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी बनाम आस्था पर डाका-धर्मेंद्र कुमार

संदर्भ: अयोध्या राम मंदिर

चढ़ावे की चोरी बनाम आस्था पर डाका -धर्मेंद्र कुमार


अयोध्या स्थित रामलला के भव्य मंदिर में जब श्रद्धा की लहरें उमड़ रही थीं, तभी चढ़ावे की चोरी की खबर ने पूरे देश के करोड़ों भक्तों को झकझोर कर रख दिया। दानपात्र से पैसा चोरी होने का अर्थ केवल नकदी का गायब होना नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के भरोसा व विश्वास पर सीधे सीधे डाका है। सवाल पैसा का नहीं है। सवाल उस विश्वास का है जिसके बल पर मंदिर खड़े होते हैं, और सभ्यताएं चलती हैं। यहां यह समझना होगा कि राम मंदिर कोई सामान्य इमारत नहीं। यह 500 साल के संघर्ष, प्रतीक्षा और पीढ़ियों की प्रार्थना का प्रतिफल है। यह चोरी समान्य चोरी नहीं है। रामलला मंदिर में चोरी का मतलब करोड़ों की आस्था पर चोट है। रिपोर्ट दर्ज हो भी जाए, पर जो विश्वास टूटता है वो रिपोर्ट में नहीं लिखा जा सकता।सबसे बड़ा सवाल है कि जब भगवान का घर सुरक्षित नहीं, तो दुनिया में क्या सुरक्षित होगा?”

ट्रस्ट और पारदर्शिता का संकट
  
तिरुपति, वैष्णो देवी, शिरडी—हर बड़े मंदिर की साख उसकी पारदर्शिता से है। CCTV, ऑनलाइन दर्शन, डिजिटल रसीद। अयोध्या विश्व का ध्यान केंद्र है। यहां की व्यवस्था तो विश्व स्तरीय होना चाहिए। क्योंकिं रामलला मंदिर में चोरी की घटना से संबंधित खबरों से पूरे विश्व में गलत संदेश जाएगा कि “दुनिया का सबसे चर्चित मंदिर भी अपने खजाने की रक्षा करने में असमर्थ है।” इससे जहां आलोचक को मौका मिलेगा, वहीं लोगों की  आस्था को ठेस पहुंचेगा। राम मंदिर जैसे राष्ट्रीय महत्व के धार्मिक स्थल पर चढ़ावे की सुरक्षा केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नैतिक कर्तव्य भी है। यदि चढ़ावे की चोरी हुई है, तो यह मंदिर प्रबंधन समिति व ट्रस्ट की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न है। और मंदिर प्रबंधन समिति अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते हैं।

आस्था बनाम धंधा

जहां आस्था है, वहां धंधे की संभावना भी जन्म लेती है। चढ़ावे की चोरी यह संकेत देती है कि श्रद्धा का लाभ उठाकर कुछ लोग इसे निजी लाभ का साधन बना रहे हैं। यह केवल मंदिर की गरिमा नहीं, बल्कि समाज की नैतिकता पर भी प्रश्न उठाता है। अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी को केवल "धन की हानि" मानना भूल होगी। यह आस्था पर डाका है, जो भक्तों के विश्वास को कमजोर करता है। मंदिर प्रबंधन और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि श्रद्धा के इस अर्पण को सुरक्षित रखा जाए। क्योंकि यदि आस्था पर बार-बार डाका पड़ता रहा, तो श्रद्धा का स्रोत ही सूख जाएगा।

क्या है समाधान

टेक्नोलॉजी के इस युग में मंदिर प्रबंधन समिति व ट्रस्ट को पूरे संदिर की सुरक्षा व्यवस्था संचालन के लिए आधुनिक टेक्नोलॉजी का सहारा लेना चाहिए। हर स्थान पर सीसीटीनी, हर दानपात्र में वेट सेंसर + कैमरा + अलार्म। ट्रस्ट की वेबसाइट पर रोज अपडेट—कितना आया, कहां खर्च हुआ। पारदर्शिता ही सबसे बड़ा ताला है। CAG ऑडिट सिर्फ सरकारी पैसा का नहीं, ‘जन-आस्था के पैसे’ का भी हो। हर तिमाही रिपोर्ट सार्वजनिक किया जाए मंदिर के वेवसाइट पर ताकि हर समान्य भक्त भी इस रिपोर्ट को प्राप्त कर सके।
रामराज्य का आदर्श था—“दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज्य नहिं काहुहि व्यापा।” न शारीरिक कष्ट, न दैवी प्रकोप, न भौतिक ठगी। 
अयोध्या में रामलला विराजमान हैं। उनके दरबार में चोरी का मतलब रामराज्य के मूल सिद्धांत पर हमला है। चढ़ावा चोरी हो जाए तो पैसा वापस आ सकता है। पर अगर आम आदमी का विश्वास चोरी हो गया तो उसे वापस लाने के लिए दूसरा 500 साल का इंतजार करना पड़ेगा? इसलिए यह मामला ‘पैसे की तिजोरी’ का नहीं, ‘राष्ट्र की तिजोरी’ का है। तिजोरी में पैसा कम हो तो भर देंगे। तिजोरी में रखा भरोसा कम हो जाए तो पीढ़ियां भर नहीं पातीं।
अयोध्या से हमें सीख मिलती है कि मंदिर बनाना आसान है, मंदिर का भरोसा बनाना कठिन। चढ़ावे की एक-एक पाई की रक्षा करना उतना ही धर्म है जितना आरती करना। क्योंकि जहां चढ़ावे पर डाका पड़ने लगे, वहां आरती की लौ भी डगमगाती है। आस्था पर डाका रोकना होगा। वरना अगली पीढ़ी यह नहीं पूछेगी कि मंदिर कहां था, वो पूछेगी—“जो मंदिर बना, उसका भरोसा कहां गया?”

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