लोकतंत्र में चंदा बना राष्ट्रीय धंधा -धर्मेंद्र कुमार


भारत में चंदा कोई साधारण शब्द नहीं, यह धार्मिक एवं राजनीतिक संरक्षण और संवर्द्धन का मजबूत आधार है। चंदा के बिना ना तो कोई सार्वजनिक धार्मिक अनुष्ठान संभव है और ना ही नेता जी का सम्मान समारोह। दरअसल चंदा से सामुहिकता का बोघ होता है। गली-मुहल्ले की पूजा,जागरण व धार्मिक अनुष्ठान से लेकर राम मंदिर तक या किसी लावारिश का दाह संस्कार करना हो या नेता जी का सम्मान समारोह हर जगह चंदा ही वह अदृश्य धागा है जो भक्तों, समर्थकों, आयोजकों और नेताओं को जोड़ता है। फर्क बस इतना है कि कहीं यह "धर्म" के नाम पर लिया जाता है, कहीं "सत्ता" के नाम पर। लेकिन हाल के वर्षों में चंदा का स्वरुप बदल गया है। अब चंदा दान ना होकर व्यापार अथवा सौ फीसदी सुरक्षित निवेश हो गया है। चंदा लोकतंत्र में एक बिजनेस मॉडल बन गया है। 

चंदा का राष्ट्रीयकरण

बचपन में मोहल्ले की पूजा उत्सवों एवं धार्मिक अनुष्ठान के लिए चंदा वसूली का नज़ारा बड़ा दिलचस्प होता था। लोग स्वेच्छा से दान करते थे, जो ज्यादा कानून झाड़ता था उसकों विभिन्न अलंकारों से सम्मानित भी किया जाता था। चंदा का राष्ट्रीयकरण तब हुआ, जब अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए पुरे देशभर से भक्तों ने दिल खोलकर चंदा दिया और नेताओं ने खजाना खोलकर लिया। जहां चंदा लेना आयोजका का धर्म था वहीं चंदा देना जनता का कर्तव्य। मंदिर बन गया, लेकिन सवाल यह है कि चंदे का हिसाब कौन देगा? यहां चंदा का हिसाब देना ना तो आयोजकों का कर्तव्य है और ना ही हिसाब मांगना जनता का धर्म।

चंदा का व्यापारिकरण

हाल के दिनों में राजनीतिक दलों ने चंदे को इतना प्रोफेशनल बना दिया है कि अब यह "दान" नहीं, बल्कि "इन्वेस्टमेंट" कहलाता है। इसमें सत्ता द्वारा दानकर्ता की घंघा  का पूरा ध्यान रखा जाता है। वहीं जिन कंपनियों पर ED-CBI की रेड पड़ती है। वो कंपनियां छापा पड़ते ही प्रोटेक्शन मनी  के तौर पर सत्ता को चंदा देती है। ADR के आंकड़ो के अनुसार 2018–24 तक राजनीतिक दलों को  कुल ₹16,518 करोड़ का चंदा प्राप्त हुआ। जिसमें 57% यानी ₹9,188 करोड़ सिर्फ इलेक्टोरल बॉन्ड से। यही है चंदा के धंधा का असली फंडा ।

चंदा और चोरी एक दूसरे के पूरक

जैसे चांद के साथ चांदनी है। वैसे ही चंदा है तो चोरी है। आयोजक का हिसाब गड़बड़ होकर भी सही रहता है। जनता कहती है कि कोई बात नहीं, भगवान सब देख रहा है। लेकिन भगवान की कृपादृष्टि अपने भक्तों पर ही बनी रहती है। क्योंक उन्हें पता है चंदा वसूलना भी बड़े परिश्रम का काम है। जो पसीना बहाएगा मलाई भी तो वहीं खाएगा ना। राजनीति के खेल भी निराले होते है चंदा आया, हिसाब गायब। लोकतंत्र में हिसाब तो सिर्फ जनता को ही देना पड़ता है। 
अब चंदा सिर्फ पूजा-पाठ का हिस्सा नहीं रहा बल्कि यह सत्ता का सबसे बड़ा धंधा बन चुका है। गली से संसद तक, मंदिर से पार्टी ऑफिस तक—हर जगह चंदा ही चंदा की गूंज है। जब चंदा राष्ट्रीय धंधा बन जाए, तो चोरी उसका राष्ट्रीय पूरक बन जाता है। लोकतंत्र चंदे से चलना चाहिए, चंदे के लिए नहीं। फर्क समझना ही गणतंत्र को बचाना है। वरना अगली पीढ़ी पूछेगी—“आज़ादी 1947 में मिली थी, नीलाम कब हुई?”

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