Friday, October 31, 2025

"कुशासन की नई परिभाषा या जंगलराज का रिवाइवल पार्ट 2?" ✍️ धर्मेंद्र कुमार




बिहार में 2025 के चुनावी मौसम ने लोकतंत्र की गरिमा को फिर से लहूलुहान कर दिया है. मोकामा में जन सुराज पार्टी के नेता दुलारचंद यादव की हत्या और सिवान में एक एएसआई की गला रेतकर हत्या ने यह साबित कर दिया कि ‘सुशासन बाबू’ के राज में कानून-व्यवस्था सिर्फ भाषणों तक सीमित हो कर रह गया है. यदि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्यमंत्री के नजर यह सुशासन व्यवस्था है तो आप सहज ही अंदाजा लगा सकते है कि जंगलराज में क्या स्थिती होगी. आज के दौर में तो यही जंगलराज पार्ट 2 है. बड़ा सवाल यही है कि क्या इसी सुशासन व्यवस्था से प्रदेश की जनमानस का कल्याण होगा, यह गंभीर चिंता का विषय है.

कुशासन का नया अवतार

आपको बता दे कि 30अक्टूबर 2025 को मोकामा के घोसवरी थाना क्षेत्र में जन सुराज समर्थक दुलारचंद यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई. वे चुनाव प्रचार में निकले थे, और यह हत्या चुनावी रंजिश का नतीजा बताई जा रही है. सिवान में एक एएसआई की गला रेतकर हत्या कर दी गई, और आरोप है कि इसमें शराब माफियाओं का हाथ है. इन दोनों घटनाओं ने बिहार की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या यह वही बिहार है जहाँ प्रधानमंत्री और गृहमंत्री द्वारा ‘सुशासन’ का दावा किया जाता है?
क्या कहते है आंकड़े
2024 में बिहार में हत्या के 3,800 से अधिक मामले दर्ज हुए, जो देश के टॉप 5 राज्यों में शामिल है. 2025 के पहले 10 महीनों में ही 3,200 से अधिक हत्या के मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से कई चुनावी रंजिश और आपराधिक गिरोहों से जुड़े हैं. शराबबंदी के बावजूद 2024 में 1.5 लाख से अधिक शराब जब्ती के मामले दर्ज हुए, और शराब माफियाओं की ताकत लगातार बढ़ती दिख रही है. यह तो महज दो वर्षों का आकड़ा है एनसीआरबी के आकड़ों के अनुसार पिछले 10 वर्षों अपराधिक घटनाओं में अप्रत्याशित बढ़ोतरी दर्ज की गई है. 

सुशासन या कुशासन
प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री लगातार 90 के दशक के ‘जंगलराज’ की बात करते हैं, लेकिन मौजूदा हालात तो प्रदेश में जंगलराज पार्ट 2 चल रहा है. बाहुबली नेताओं की वापसी हो चुकी है. पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता ने जनता का भरोसा डगमगा रहा है. ऐसा लगता है कि “बिहार में अब कुशासन का नया ब्रांड लॉन्च हुआ है—‘सुशासन 2.0’, जिसमें अपराधी VIP हैं और जनता RIP!”
बिहार की जनता को यह समझना होगा कि चुनाव सिर्फ वोट डालने का नहीं, जवाब मांगने का भी पर्व है. जब जनप्रतिनिधि सुरक्षा देने में नाकाम हों, और प्रशासन सिर्फ चुनावी रैलियों की भीड़ गिनने में व्यस्त हो, तो लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है. अब वक्त है कि जनता सवाल पूछे—कुशासन की इस नई परिभाषा में हमारा भविष्य कहाँ है?

Thursday, October 30, 2025

लोकतंत्र में लोकलुभावन वादों से कैसे होगा जनता का कल्याण? धर्मेंद्र कुमार


बिहार में चुनाव आते ही नेताओं की जुबान पर "जनकल्याण" के जुमले चिपक जाते हैं. इस दौरान हर गली, नुक्कड़, और चाय की दुकान पर बिना बादल, बिना मौसम, और बिना गारंटी के लगातार वादों की बरसात होती रहती है. हर चुनाव में नेता थोक के भाव में वादे करते हैं जैसे "हर युवा को नौकरी", "हर खेत को पानी", "हर घर को बिजली", और "हर वोट को सम्मान",महिलाओं को आर्थिक रुप से सशक्त बनाने के ले लोखों रुपये के लोन. अब तो नेताओं ने लोगों के आस्था को भी चुनावी वादों में शामिल करने का प्रयास किया. लेकिन जैसे ही चुनाव समाप्त होता है, नेताओं के ये खोखले वादे भी जुमलों में तब्दिल हो जाते हैं. जनता खेतों में पानी ढ़ूढ़ती रहती है और नेता सत्ता की मलाई चाभने में व्यस्त और मस्त रहते है. यही भारतीय लोकतंत्र की विशेषता है. हर पांच वर्षों के बाद सारी बेशर्मी को ताख पर रख कर उन्हीं वादों के साथ पुनः नेता जी जनता के समक्ष वोट मांगने के लिए प्रकट हो जाते है. यह भारतीय जनमानस की हृदय विशालता का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि जनता हर बार नेताओं के वादों पर भरोसा कर उन्हें अना समर्थन देती है. लेकिन मोटी चमड़े वाले नेताओं की नियत भी कुत्ते की दुम की तरह ही होती है.
आपको बता दें कि  लोकतंत्र में वादे करना एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है. इसमें पहले जनता की भावनाओं को मापा जाता है, फिर उन्हें लुभाने के लिए शब्दों का ऐसा मिश्रण तैयार होता है जो सुनने में तो मधुर व मनभावन लगे, लेकिन पूरा करना असंभव हो. शायद इसे ही "चुनावी जुगलबंदी" कहते हैं. जहां तक चुनावी वादों के बिहार मॉडल की बात है, तो यहां चुनावी वादे ऐसे होते हैं जैसे "बिहार को सिंगापुर बना देंगे", कोई कहता है "हर छात्र को लैपटॉप देंगे", और कोई तो "बेरोजगारी भत्ता" को ऐसे पेश करता है जैसे शादी में मिठाई बांटी जा रही हो.
 जनकल्याण की धारणा वास्तव में एक रहस्य है. नेता इसे हर भाषण में दोहराते हैं, लेकिन इसको पूरा करने का कोई ठोस आधार नहीं बताते हैं. शायद यह वही चीज है जो चुनाव के बाद गायब हो जाती है, जैसे सरकारी योजनाओं का बजट.  जब तक वादों की पूर्ति की कोई जवाबदेही नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र लोकलुभावन वादों का अखाड़ा बना रहेगा. जनता हर बार उम्मीदों की गठरी लेकर वोट देगी और हर बार उसकी झोली खाली ही रहेगी. क्योंकि कड़वी हकिकत यही है कि सिर्फ भाषण से कभी राशन नहीं मिलता.

Tuesday, October 28, 2025

बिहार चुनाव 2025: कांग्रेस की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन? ✍️धर्मेंद्र कुमार



“हवाहवाई रणनीति और ओवरकॉन्फिडेंस ने कांग्रेस को डुबोया

         

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कांग्रेस पार्टी की स्थिति एक शिकस्त खाई टीम जैसी दिख रही है. जिसका न तो रणनीति स्पष्ट, न संगठन मजबूत, और न ही नेतृत्व में वह समझदारी जो एक बड़े गठबंधन में अपेक्षित होती है. वोटर अधिकार यात्रा के दौरान मिले अपार जनसमर्थन के भ्रम में उलझे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं व रणनीतिकारों के अति उत्साह व ओवरकॉन्फिडेंस के कारण बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस न सिर्फ सीटों के मामले में पिछड़ गई बल्कि गठबंधन में उसकी स्थिती भी कमजोर हुई है. शुरुआती दौर में कांग्रेस के पास बार्गेनिंग पावर था लेकिन नेताओं के ओवरकॉन्फिडेंस के कारण सब गड़बड़ा गया. 

 नेतृत्व का ओवरकॉन्फिडेंस होना

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व व रणनीतिकारों के ओवरकॉन्फिडेंस के कारण प्रथम दृष्टया में बिहार विधानसभा चुनाव में नुकसान होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की चुनावी रणनीति बनाने व निर्णय लेने में हुई देरी के कारण पार्टी को सीटों का नुकसान हुआ. वहीं तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने में हिचकिचाहट दिखाना और फिर अंततः समर्थन देना. यह द्वंद्व पार्टी की असमंजस भरी स्थिति को दर्शाता है. वोट अधिकार यात्रा के दौरान जो जनसमर्थन इंडिया गठबंधन को मिला, उसे कांग्रेस ने अपने पक्ष में समझने की भूल की, जिससे रणनीतिक भ्रम पैदा हुआ. जब पार्टी के पास अपनी शर्तों पर गठबंधन के दलों के साथ बार्गेंनिंग करने का मौका था. तब नेताओं के ओवरकॉन्फिडेंस के कारण वे चुक गए. जिसका खामियाजा उन्हें कम सीटों के तौर पर भुगतना पड़ा. समय पर बार्गेंनिंग नहीं हो पाने के कारण असमंजस की स्थिती पैदा हो गई. जिसके कारण लगभग एकदर्जन सीटों पर राजद और कांग्रेस दोनो ने अपने उम्मीदवार मैदान में उतार दिए. इससे जनता में गलत मैसेज गया, जिसका नुकसान निश्चित रुप से गठबंधन को होना तय है.

 संगठनहीनता और जातिगत समीकरण की अनदेखी
पार्टी के शीर्ष नेताओं को बिहार में अपने संगठन की स्थिती के आधार पर निर्णय लेना चाहिए था. ऐसा लगता है कि कांग्रेस के नेताओं ने बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर ठीक से होमवर्क नहीं किया यही कारण है कि सब कुछ हवाहवाई में रह गया. यदि पार्टी के रणनीतिकार चुनाव को लेकर होमवर्क किए होते तो आज स्थिती कुछ और होती. वहीं प्रदेश प्रभारी कृष्णा अल्लावरू की बिहार की जातिगत और सामाजिक संरचना की समझ सीमित रही, जिससे टिकट वितरण में भारी चूक हुई. लगभग डेढ़ दर्जन सीटें ऐसे उम्मीदवारों को दी गईं. जिनके तार एनडीए से जुड़े रहे हैं. यह न सिर्फ गठबंधन की नीति के खिलाफ था, बल्कि मतदाताओं के विश्वास को भी डगमगाने वाला कदम है वहीं पार्टी कार्यकर्ताओं में निराशा का भाव उत्पन्न होना भी स्वाभाविक है.
 टिकट वितरण में खेल और अंदरूनी असंतोष
कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा पार्टी के वैसे नेताओं को बिहार विधानसभा से अलग रखना नुकसानदेह साबित हुआ. जो बिहार की राजनीति एवं जातिगत समीकरण को बेहतर ढ़ग से समझते हैं. टिकट वितरण में बड़े पैमाने पर गुटबाज़ी और व्यक्तिगत समीकरणों का बोलबाला रहा. कई जिलों में स्थानीय नेताओं की अनदेखी की गई, जिससे जमीनी कार्यकर्ता हतोत्साहित हुए. पार्टी ने सर्वे और फीडबैक के बावजूद दो मौजूदा सीटें गंवा दीं, जो रणनीतिक विफलता का स्पष्ट संकेत है. 
चुनाव से पहले राहुल गांधी की सक्रियता और वोटर अधिकार यात्रा ने कुछ उम्मीदें जगाईं थी, लेकिन नेतृत्व की चुप्पी, निर्णय में देरी और संगठन की निष्क्रियता ने इन उम्मीदों को धुंधला कर दिया है ऐसा प्रतीत होता है. कांग्रेस ने आरजेडी के साथ आंख में आंख मिलाकर बात करने की कोशिश की, लेकिन सीट बंटवारे और सीएम फेस पर स्पष्टता की कमी से गठबंधन कमजोर हुआ. हालांकि 29 अक्टूबर से राहुल गांधी बिहार में तेजस्वी के साथ चुनाव प्रचार की शुरुआत करेंगे. यह देखना दिलचस्प होगा कि जब राहुल और तेजस्वी की जोड़ी चुनावी मैदान में प्रचार करने उतरती है तो इसका कितना प्रभाव पड़ता है.
बिहार चुनाव 2025 कांग्रेस के लिए परीक्षा की घड़ी है. संगठन के बिना उम्मीदें पालना आत्मघाती है. यदि पार्टी को भविष्य में कोई भूमिका निभानी है, तो उसे नेतृत्व में स्पष्टता, संगठन में मजबूती और ज़मीनी हकीकत की समझ विकसित करनी होगी. वरना हर चुनाव में कांग्रेस सिर्फ गठबंधन का “अनिवार्य लेकिन अप्रभावी” घटक बनकर रह जाएगी.

चुनावी मौसम में नेता जी का राजनीतिक योगाभ्यास व प्राणायाम धर्मेंद्र कुमार


बिहार में चुनावी मौसम आते ही नेता जी का शरीर लचीला हो जाता है. नहीं, योगाभ्यास से नहीं बल्कि वोट पाने की साधना से. हर पांच साल में एक बार नेता जी पूरे जतन से ‘वोट-योग’ की तपस्या करते हैं, जिसमें वे जनता को लुभाने के लिए ऐसे-ऐसे आसन करते हैं कि बड़े बड़े योग गुरु भी अचंभित जाएं. इसमें तो कई नेताओं को महारत हासिल है. चुनाव के दौरान नेता जी द्वारा राजनीतिक योगासन के विभिन्न आसन के माध्यम से जनता को उनकी बेहतर राजनीतिक स्वास्थ्य का जानकारी प्रदान करते हैं. इन राजनीति आसन से किसे कितना फायदा पहुंचा है यह विमर्श का विषय हो सकता है लेकिन नेता जी हर पांच वर्षों पर यह करते जरुर हैं.
 वादाासन
सबसे पहले नेता जी के वादासन की बात करें तो इस आसन में जनता के सामने वादों की माला जपते हैं कि जीतने के साथ ही “हर खेत तक पानी पहुंचेगा,” “हर हाथ को काम मिलेगा,” “हर सड़क पर विकास दौड़ेगा.” इस आसन में नेता जी की गर्दन ऊपर, आंखें चमकदार, और ज़ुबान इतनी लचीली कि कल के वादे आज के बयान से मेल न खाएं तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता.
 पलटासन
पलटासन नेता जी का पसंदीदा आसन है. इसमें वे अपने कपड़ों की तरह पुराने बयानों को पलटते हैं, गठबंधन बदलते हैं, और विचारधारा को योगा मैट की तरह मोड़ते हैं. कल जो विरोधी था, आज वही सहयोगी है. कल जो “जनविरोधी” था, आज “जनसेवक” बन गया है. जनता पूछे तो जवाब मिलता है—“राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता, बस स्थायी कुर्सी होती है.” बिहार की जनता ने कई बार इस पलटासन को देखा समझा और जाना है.
  राजनीतिक प्राणायाम
इसमें नेता जी सांसों के साथ भावनाएं फूंकते हैं—कभी जाति, कभी धर्म, कभी क्षेत्रीय गौरव. “हम आपके हैं, आप हमारे हैं.”बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाएंगे लेकिन समय नहीं बताएंगे, “हमने किया है, हम ही करेंगे.” इस प्राणायाम में जनता की सांसे भले थम जाए, लेकिन नेता जी नजरे उनकी वोट पर टिकी होती है.
नेता जी के राजनीतिक योगाभ्यास व प्राणायाम के दौरान जनता को चाहिए कि वह अपना ‘बुद्धि-योग’ साधे. ना सिर्फ वादा सुनें, अपितु उसे याद भी रखें और नेता जी को गाहे बगाहे उनके वादों की याद भी दिलाती रहें ताकि नेता जी को भी सनद रहे कि जनता भी उनके राजनीतिक योग को बेहतर समझती है. "नेता जी का योग तभी सफल माना जाएगा, जब जनता का लोकतंत्र स्वस्थ और सजग हो. लोकतंत्र में सबसे बड़ा योग वही है, जो जनता को जागरूक बनाता है, और नेता को जवाबदेह.

Sunday, October 26, 2025

लोकआस्था के महापर्व छठ के आसरे लोकतंत्र का महापर्व को साधने की कवायद धर्मेंद्र कुमार



लोकआस्था का महापर्व छठ केवल एक पर्व नहीं अपितु त्याग,समर्पण,श्रद्धा, अनुशासन और सामाजिक समरसता का जीवंत दस्तावेज है. यह वह क्षण होता है जब करोड़ों श्रद्धालु प्रकृति, सूर्य और जल के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं. आस्था से जुड़ा दुनिया का एक मात्र ऐसा पर्व है जिसमें सबसे पहले डुबते हुए (अस्ताचलगामी) सूर्य को अर्घ्य देते हैं इस विश्वास के साथ कि कल नई उर्जा, उम्मीद व आकांक्षा के प्रतिकके तौर सबके कल्यार्थ भगवान भास्कर का उदय होगा और दूसरे दिन छठ व्रती उदीयमान अर्थात उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं. यही इस पर्व की विशेषता और महानता है. लेकिन जब केवल सत्ता के लिए इस आस्था का राजनीतिकरण किया जाता है, तो सवाल उठते हैं और उठने भी चाहिए.
 यमुना किनारे आस्था बनाम व्यवस्था
दिल्ली में छठ पूजा के लिए यमुना नदी के किनारे लाखों श्रद्धालु जुटते हैं. लेकिन इस बार दृश्य कुछ अलग होगा. आप जानते है कि बिहार में चुनाव का माहौल है और देश की राजधानी में बिहारियों की अच्छी खासी आबादी है तो भला प्रधानमंत्री कैसे पीछे रह जाते है. तो सोमवार की शाम को देश के प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी भी लोकआस्था के महापर्व के अवसर पर छठ व्रतियों के साथ यमुना नदी के घाट पर भगवान सूर्य को अर्घ्य देंगे देना भी चाहिए. लेकिन यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रधानमंत्री के लिए यमुना नदी के किनारे एक विशेष घाट बनाया गया है. नकली यमुना जिसमें फिल्टर पानी भरा गया है. वहीं आम जनता उसी असली यमुना में खड़ी हो कर भगवान सूर्य को अर्घ्य देगी, जिसकी हालत दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति की रिपोर्ट के अनुसार "गंदा ही नहीं, जहरीला" है.
सवाल यह नहीं कि प्रधानमंत्री अर्घ्य देंगे, सवाल यह है कि पिछले 11 वर्षों में उन्हें छठ की याद क्यों नहीं आई? और अब जब बिहार की राजनीति गरम है, तो अचानक सूर्योपासना की आस्था क्यों जाग गई?
 आस्था या राजनीतिक अवसरवाद
भाजपा ने इस बार छठ को एक राजनीतिक अवसर की तरह साधने के लिए वासुदेव घाट पर प्रधानमंत्री के लिए वजीराबाद जल शोधन संयंत्र से पाइपलाइन द्वारा फिल्टर पानी लाया गया. आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया कि यह पूर्वांचलियों को "मूर्ख बनाने" की कोशिश है. छठ के बहाने पूर्वांचलियों को लुभाने की कोशिश कोई नई बात नहीं. लेकिन जब आस्था को दिखावे और वोट के गणित से जोड़ दिया जाए, तो यह लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचाता है.

आम जनता के लिए जहरीली यमुना 

दिल्ली जल बोर्ड ने हथिनीकुंड बैराज से अतिरिक्त पानी छोड़ने और डी-फोमिंग स्प्रे के प्रयोग की बात कही. लेकिन क्या यह पर्याप्त है? रिपोर्टों के अनुसार यमुना में मल पदार्थ की मात्रा खतरनाक स्तर पर है. ऐसे में आम श्रद्धालु की सुरक्षा और स्वास्थ्य का क्या?
प्रधानमंत्री के लिए अलग घाट, अलग पानी, अलग व्यवस्था और आम जनता के लिए वही जहरीली यमुना. क्या यही लोकतंत्र है? क्या यही लोकआस्था का सम्मान है?
लोकआस्था के महापर्व छठ में दिखावा बिलकुल स्वीकार्य नहीं होता. व्रती बिना नमक का भोजन करते हैं, दिन-रात उपवास रखते हैं, और नदी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं. यह त्याग, अनुशासन और श्रद्धा का पर्व है. लेकिन जब इसी पर्व को राजनीतिक अवसर बना दिया जाए, तो यह आस्था का अपमान है.
लोकतंत्र का महापर्व चुनाव है. लेकिन अगर उसमें लोक की आस्था को केवल वोट के लिए इस्तेमाल किया जाए, तो यह लोकतंत्र नहीं, अवसरवाद है. छठ के बहाने राजनीति करना तो आसान है, लेकिन आस्था की गहराई को समझना बहुत कठिन.

Saturday, October 25, 2025

बिहार चुनाव 2025: सवर्ण समाज की राजनीति में वापसी की बेचैनी धर्मेंद्र कुमार



बिहार की राजनीति में सवर्ण जातियों ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ—का एक दौर था जब वे सत्ता के केंद्र में थे. 90 के दशक से पहले कांग्रेस की रीढ़ यही वर्ग था. फिर सामाजिक न्याय की लहर आई और लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में पिछड़ा वर्ग राजनीति का नया चेहरा बना. हालांकि सामाजिक न्याय के नाम पर लालू में पिछड़ी जातियों का कितना विकास किया यह चर्चा का विषय हो सकता है. लेकिन उन्होंने अगड़ों और पिछड़ों के बीच एक गहरी खाई जरुर बना दी. लालू ने अगड़ी जाति को पिछड़ी जाति के एक दुश्मन के तौर पर पेश करने की पूरजोर कोशिश कि जिसके परिणाम स्वरुप 90 के दशक में कई नरसंहार हुए. जिसमें अगड़ी और पिछड़ी दोनो जातियों के लोगों की जानें गई. लालू प्रसाद ने सामाजिक न्याय के आसरे सत्ता पर काबिज हुए और बिहार का बंटाधार कर दिया. पिछड़ी जातियों को रोजगार नहीं देकर उनके हाथों में लाठी डंडे जरुर थमा दिए. वहीं 2005 में नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली और भाजपा के साथ मिलकर एक नया समीकरण गढ़ा जिसमें सवर्णों ने फिर से निर्णायक भूमिका निभाई. लेकिन आज 2025 के चुनावी परिदृश्य में सवर्ण समाज खुद को राजनीतिक हाशिए पर महसूस कर रहा है. 
 जनसंख्या में गिरावट, हिस्सेदारी में कटौती
बिहार की जातिगत जनगणना के अनुसार सवर्ण जातियों की कुल आबादी लगभग 15% है. जिसमें राजपूत 5%, भूमिहार 5%, ब्राह्मण 4% और कायस्थ 1–1.2% की आबादी शामिल है. इस सीमित जनसंख्या के कारण राजनीतिक दलों ने टिकट वितरण में इन जातियों को प्राथमिकता देना बंद कर दिया है. 2025 के चुनाव में टिकटों की संख्या देखें तो राजपूतों को अपेक्षाकृत अधिक टिकट मिले वहीं भूमिहार को भी ठीक ठाक प्रतिनिधित्व मिला. लेकिन ब्राह्मण और कायस्थों की हिस्सेदारी नगण्य रही.
 राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं बदली
आज की राजनीति में पिछड़ा वर्ग (OBC), दलित और मुस्लिम वोट बैंक को साधना प्राथमिकता बन चुकी है. सवर्ण समाज, जो कभी सत्ता का निर्णायक स्तंभ था, अब "गणना में नहीं, गिनती में है". राजनीतिक दलों की रणनीति अब संख्यात्मक प्रभाव पर आधारित है, न कि ऐतिहासिक योगदान पर.
 सवर्ण समाज की बेचैनी और आत्ममंथन
बिहार के चुनाव में सवर्ण समाज के भीतर एक नई बेचैनी दिख रही है. पिछले दिनों बाहुबली नेता और पूर्व सांसद आनंद मोहन ने रघुवंश प्रसाद सिंह की पुण्यतिथि पर कहा कि “बिहार की सत्ता का फैसला ‘भूरा बाल’ करेगा.” यहाँ ‘भूरा बाल’ का अर्थ है भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला (कायस्थ). यह बयान न सिर्फ सवर्ण समाज को एकजुट होने का संकेत देता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सत्ता की चाबी अब भी इनके पास हो सकती है—यदि वे संगठित हों. वहीं भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूढ़ी ने कहा कि “मैं सवर्णों की आवाज बन चुका हूं. अब समय आ गया है कि सवर्ण समाज एकजुट हो.” उन्होंने यह भी दावा किया कि बिहार की 70 सीटों पर राजपूत समाज निर्णायक भूमिका निभा सकता है. उनका यह बयान सवर्ण समाज के भीतर नेतृत्व की तलाश और राजनीतिक पुनर्स्थापन की भावना को दर्शाता है. इन नेताओं के बयानों ने सवर्ण समाज को एक बार सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम सिर्फ "डालने वाले वोटर" रह गए हैं? क्या हमारी भूमिका अब सिर्फ "बैकबेंचर" की रह गई है?
इन सवालों ने सवर्ण समाज को आत्ममंथन की स्थिति में ला दिया है. कई युवा सवर्ण अब राजनीतिक दलों से दूरी बना रहे हैं, तो कुछ नए मंचों की तलाश में हैं. संख्या कम होने के बावजूद सवर्ण समाज का वोट निर्णायक हो सकता है. बशर्ते वो एकजूट हों. लगभग 70 सीटों पर सवर्ण समाज निर्णायक की भूमिका निभा सकते है, यदि वो एकजुट होकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करें. कई सीटों पर तो हार-जीत का अंतर 5–10% वोट से तय होता है. यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अपनी प्रतिष्ठा को बचाने के लिए सवर्ण समाज एकजुट होकर वोट करेगा या फिर वहीं ढ़ाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ होगी. 
बिहार की राजनीति में सवर्ण समाज भले ही संख्या में कम हो, लेकिन उसकी ऐतिहासिक भूमिका, वैचारिक ताकत और संगठित चेतना उसे आज भी निर्णायक बना सकती है. 2025 का चुनाव सवर्ण समाज के लिए सिर्फ वोट डालने का नहीं, अपना अस्तित्व बचाने का चुनाव है.

Tuesday, October 21, 2025

नीतीश ही होंगे मुख्यमंत्री इससे किसे है इंकार

बीजेपी को चाहिए बिहार में रिमोट कंट्रोंल सीएम
                        धर्मेंद्र कुमार

बिहार की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर है जहां तमाम उठापटक, गठबंधन, बयानबाज़ी और एक दूसरे को पछाड़ने की रणनीति के बावजूद एक नाम सबसे ऊपर है या यूं कहे कि उनके बिना बिहार की राजनीति की चर्चा अधूरी है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. जी हां आपने सही पहचाना मैं नीतीश कुमार की बात कर रहा हूं. 2025 के विधानसभा चुनावों की सरगर्मी के बीच यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? लेकिन जवाब हर बार नीतीश की ओर ही इशारा करता है. मैंने अपने पिछले आलेख में इस बात का जिक्र किया था कि नीतीश के बाद कौन लेकिन जबाव किसी के पास नहीं है.
नीतीश ने बिहार को विकास पथ पर बढ़ाया आगे
 नीतीश कुमार अब मात्र एक नेता नहीं रहे बल्कि वे बिहार के विकास मॉडल के एक ब्रांड के तौर पर स्थापित हो चुके हैं. संभव है आपको मेरी यह बात ठीक ना लगे, लेकिन जिन लोगों ने बिहार के लालू राज व 90 के दशक को देखा, समझा औऱ भोगा है उनके लिए तो हर हाल में नीतीश कुमार ही स्वीकार्य होंगे. यह ठीक है कि 20 वर्षों के शासनकाल में बिहार का जितना विकास होना चाहिए था उतना नहीं हो पाया, विशेषकर रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में औऱ आज भी बिहार सबसे पिछड़ा औऱ बीमारु प्रदेश के तौर पर जाना ताजा है. निश्चित रुप से इसके लिए नीतीश ही जिम्मेवार है लेकिन बिहार में आज जो आधारभूत संरचना के मामले में तरक्की हुई है उसका क्रेडिट तो कुमार की इच्छाशक्ति जाता है. उन्होंने कभी भी जातिगत राजनीति को साधने के लिए बिहार के विकास के साथ समझौता नहीं किया. तभी आज बिहार में सड़कों का जाल सा बिछ गया है. हाल के कुछ महीनों में बिहार में अपराधिक घटनाओं में वृद्धि हुई है जो चिंता का विषय तो है. वहीं सरकार के मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बावजूद नीतीश की खामोशी, उनको जानने वालों को लिए भी अनबुझ पहेली नब गई है. उनकी खामोशी का राज क्या है सीएम की कुर्सी या अप्रत्यक्ष दबाव ?

बीजेपी को चाहिए बिहार में रिमोट कंट्रोल मुख्यमंत्री
एनडीए ने भले ही अब तक नीतीश कुमार को औपचारिक रूप से मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित नहीं किया है, लेकिन चुनावी तैयारियों और प्रचार में उनका नाम और चेहरा लगातार सामने आ रहा है. भाजपा के शीर्ष नेता अमित शाह ने हाल ही में नीतीश से मुलाकात की और चुनावी रणनीति पर चर्चा की. लेकिन मुख्यमंत्री के चेहरा के नाम पर विधायक दल के नेता तय करने की बात कह कर नीतीश को मुख्यमंत्री का चेहरा खुले तोर पर घोषित करने से बचते दिखे. बीजेपी की मजबूरी कहे या जरुरत बिना नीतीश के अपने दम पर बिहार में बीजेपी के लिए सरकार बनाना संभव नहीं है. इसलिए नीतीश पर दबाव बनाने के लिए चिराग पासवान को 29 सीट देकर जदयू पर अप्रत्यक्ष रुस से दबाव बनाने का प्रयास किया गया. भाजपा का नेतृत्व यह जानता है कि यदि सीधे सीधे नीतीश को मुख्यमंत्री मानने से इंकार कर दिया तो संभव है कि नीतीश एक बार फिर इंडिया गठबंधन की ओर रुख कर दे जिसकी संभावना हर समय बनी हुई है. वहीं उनके वोट बैंक का लाभ भी नहीं मिल पाएगा. इसलिए बीजेपी नीतीश को उनके ही दल में अलग थलग करने की रणनीति पर काम कर रही है. जिसका एहसास भी उनको हो गया है. भाजपा को बिहार में एक ऐसा मुख्यमंत्री चाहिए जो रिमोट से कंट्रोल हो और उनके इशारे पर काम करें. ताकि वो बिहार में अपना एजेंडा सेट कर सकें. यही कारण है कि तमाम गंभीर आरोपों के बावजूद सम्राट चौधरी के खिलाफ पार्टी द्वारा कोई कार्रवाई नहीं किया जाना यह स्पष्ट संकेत है कि यदि गणित ठीक बैठ गया तो सम्राट चौधरी को सीएम बनाया जा सकता है. ताकि चौधरी के आसरे बिहार को साधा जा सके.

महागठबंधन की खुलती खिड़की
राजद और महागठबंधन के भीतर भी नेतृत्व को लेकर असमंजस है. तेजस्वी को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का चेहरा खेल तौर पर स्वीकार नहीं किया है क्योंकि इसकी अबतक महागठबंधन की और से आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है. क्योंकि अंदरखाने में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. यही कारण है कि गठबंधन स्तर पर कोई सर्वमान्य चेहरा अब तक सामने नहीं आया. ऐसे में अगर चुनाव परिणामों में जदयू को अपेक्षित सीटें नहीं मिलतीं और एनडीए नीतीश को दरकिनार करने की कोशिश करता है, तो यह संभावना बलवती हो जाती है कि नीतीश कुमार महागठबंधन की ओर रुख कर सकते हैं. नीतीश का राजनीतिक इतिहास भी इस संभावना को मजबूत करता है. वे पहले भी परिस्थितियों के अनुसार गठबंधन बदलते रहे हैं, और हर बार सत्ता की चाबी उन्हीं के हाथ में रही है. राजद सुप्रीमों लालू प्रसाद ने भी संकेत दिया है कि यदि नीतीश महागठबंधन के साथ आते है तो वे ही मुख्यमंत्री होंगे. वे जानते है कि नीतीश के आसरे बिहार की सत्ता पर आसानी से काबिज हुआ जा सकता है. उनके लिए ऐनकेन प्रकारेण सत्ता में बने रहना जरुरी है.
जनता की पसंद और राजनीतिक गणित
बिहार की जनता नीतीश को सुशासन बाबू के रूप में जानती है. उनके नेतृत्व में राज्य ने कई मोर्चों पर सुधार देखा है. यही कारण है कि भाजपा जैसे दल भी उनके नाम को पूरी तरह नकार नहीं सकते. उत्तराखंड और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री तक बिहार आकर नीतीश के नेतृत्व में विकास की बात कर रहे हैं. सबसे बड़ी बात की नीतीश पर कोई सीधे तौर पर दाग नहीं है और बिहार के विकास को लेकर विजन भी साफ है. इसकी बानगी तो बिहार में देखने को मिल रही है. हालांकि हाल के दिनों पर शासन व्यवस्था पर नीतीश की पकड़ बहुत कमजोर हुई है. इसके पीछे उनका स्वास्थ्य एक बड़ा कारण हो सकता है. लेकिन इन सबके बावजूद नीतीश के मुख्यमंत्री होने को लेकर कोई भी दल खुलकर विरोध करने की स्थिती में नहीं है इसका सबसे मजबूत कारण उनके साथ मजबूती के साथ खड़ा अति पिछड़ों का एक बड़ा वोट बैंक है जो नीतीश को अपना सर्वमान्य नेता मानता है. बिहार की राजनीति में चाहे जितनी भी चालें चली जाएं, एक बात साफ है—नीतीश कुमार को पूरी तरह नकारना किसी भी गठबंधन के लिए आसान नहीं होगा. वे न केवल राजनीतिक अनुभव का पर्याय हैं, बल्कि सत्ता संतुलन के ऐसे केंद्र हैं जिनके बिना कोई भी समीकरण अधूरा है.
वहीं, टिकट वितरण में असंतोष और बगावत की खबरें एनडीए और महागठबंधन दोनों में हैं. ऐसे में एक स्थिर और अनुभवी नेतृत्व की तलाश में नीतीश कुमार फिर से सबसे उपयुक्त विकल्प बन जाते हैं.

Friday, October 10, 2025

जूता की गाथा: जूता बढ़ाए मान, जूता से हो अपमान धर्मेंद्र कुमार

 
जब शब्दों की चोट कम पड़ जाए, तब जूता बोलता है. यह गाथा उन जूतों की है, जो सिर्फ पैरों में नहीं रहे—कभी मंच पर उछले, कभी संसद में गूंजे, और कभी सड़क पर न्याय की पुकार बने. यह कथा है उन जूतों की, जो मौन नहीं रहे. जो सत्ता को चुनौती भी देते हैं, और कभी-कभी खुद सत्ता का प्रतीक बन जाते हैं.
जूता एक साधारण वस्तु नहीं, बल्कि एक असाधारण कथा है. यह सिर्फ चमड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि समाज का आईना है. जो जूता बनाता है, वह समाज की सीढ़ी के सबसे नीचे पायदान पर खड़ा होता है, और जो पहनता है, वह ऊँचाई पर बैठा अपनी प्रतिष्ठा नापता है. यही है हमारी सामाजिक विडंबना कि जूता बनाने वाला दलित होता है, जबकि पहनने वाला स्वर्ण जाति का . और बनाने वाले दलित को स्वर्ण समाज के समक्ष उसे पहनने की इजाजत भी नहीं है. जूता बनाने वाले को सदियों से दलित(‘नीच’) कहा गया, लेकिन उसके बनाए जूते ने ‘उच्च’ वर्ग की चाल को संभाला. समाजवाद की किताबों में बराबरी की बातें होती हैं, लेकिन जूता बताता है कि बराबरी सिर्फ भाषणों तक सीमित है. जूता पहनने वाला मंच पर भाषण देता है, और बनाने वाला मंच के नीचे बैठा तालियाँ बजाता है.
जहां चमकदार जूता आपकी हैसियत का प्रमाणपत्र है वहीं फटा हुआ जूता आपकी औकात का खुलासा. जूता देखकर लोग तय करते हैं कि आप किस कुर्सी पर बैठने लायक हैं.  और दुल्हे को शादी में जूते की कीमत तब समझ आती है जब सालियाँ उसे चुरा लेती हैं. वह जूता नहीं, दहेज का हिस्सा हो जाता है.जिसे पाने के लिए बड़ी मशक्कत के साथ कीमत भी चुकानी पड़ती है.
 जब न्यायालय के शीर्ष पर बैठे न्यायमूर्ति पर जूता फेंका गया, तब जूता सिर्फ वस्तु नहीं रहा बल्कि वह प्रतिरोध का प्रतिक बन गया.  वह चीख था उस वर्ग का, जिसकी आवाज़ अदालतों में नहीं सुनी जाती है. जूता तब गूंगा नहीं था, वह बोल रहा था—“अब बहुत हो गया.”
 जब मंदिर में पूजा करके बाहर आने पर जब जूता नदारद मिले तो समझ में आता है कि भगवान ने आशीर्वाद नहीं बल्कि कर्मों का हिसाब चुकता कर दिया है. मंदिर से  जूता का गायब होना पुण्य नहीं बल्कि  पापों की रसीद है. कभी-कभी लगता है कि भगवान भी कह रहे हैं—“अब नंगे पाँव चलो, ताकि अहंकार उतर जाए.”
 जूते भी कई प्रकार के होतें हैं. राजनीतिक जूता जो विरोध में उड़ता है, शादी वाला जूता  जो प्रेम और लेन-देन का प्रतीक है. स्कूल का जूता जो अनुशासन की मार झेलता है. फटा जूता जो गरीबी का दस्तावेज़ है और ब्रांडेड जूता जो दिखावे की दौड़ में सबसे आगे है. सैनिकों के जूते संघर्ष और समर्पण की कहानी कहते है. वह जाति धर्म से उपर उठ कर देश की सरहदों पर हर वक्त सैनिकों के साथ देश की सुरक्षा में तैनात रहता है. वह किसी भी परिस्थिती में देश के सम्मान के साथ समझौता नहीं करता जब कभी दुश्मनों के साथ संघर्ष के दौरान सैनिक शहीद हो जाता है तब भी जूता उसका साथ नहीं छोड़ता यही उसकी देश,समाज और सैनिक के प्रति समर्पण है.
 जूता अब सिर्फ पहनने की वस्तु नहीं रहा, जहां वह हमारे समाज के ताने बाने में भेदभाव का प्रतिक है, वहीं सत्ता का प्रतीक है, और विरोध की भाषा है. जूता दिला सकता है मान, और जूता से हो सकता है अपमान. इसलिए अगली बार जब आप जूता पहनें, तो सोचिएगा—आप क्या पहन रहे हैं? एक वस्त्र? या एक विचार? जय राम जी की

Tuesday, October 7, 2025

पूर्वी सिंहभूम कांग्रेस में बगावत के सुर: कार्यकर्ता बोले, नहीं चलेगा मनमाना फैसला



सिख समुदाय की वापसी की उम्मीद: कांग्रेस ने परविंदर सिंह पर जताया भरोसा

जमशेदपुर। (धर्मेंद्र कुमार) कांग्रेस पार्टी आलाकमान की ओर 4 अक्टूबर को झारखंड प्रदेश के नव नियुक्त जिला अध्यक्षों की सूची जारी की गई. सूची जारी होने के साथ ही प्रदेश स्तर पर नव नियुक्त अध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोल दिया है. यह विवाद अब थमने का नाम नहीं ले रहा है. पूर्वी सिंहभून,देवघर,हजारीबाग सहित कई अन्य जिलों में कार्यकर्ताओं ने विरोध के स्वर को बुलंद किया है. सोशल मीडिया पर बयान जारी किए जा रहे हैं. वहीं पार्टी आलाकमान को पत्र एवं ईमेल के माध्यम से जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में कथित तौर पर हुई गड़बड़ी से संबंधित जानकारी दी गई है. वहीं पर्वेक्षक द्वार भेजी गई सूची को सार्वजनिक करने की मांग की गई है. हालांकि अभी तक पार्टी इस संबंध बहुत गंभीर नहीं दिख रही है.

मनोनित ही करना तो रायशुमारी का नाटक क्यों
कांग्रेस के प्रदेश स्तरीय एक वरिष्ठ नेता ने नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर बताया कि जिला अध्यक्षों कि नियुक्ति को लेकर पार्टी द्वारा जो प्रक्रिया अपनाई गई थी, कार्यकर्ताओं ने उसका स्वागत किया था. कार्यकर्ताओं को विश्वास था कि इस बार चुनाव निष्पक्ष होगा. लेकिन जिला अध्यक्षों की नियुक्ति से जाहिर होता है कि रायशुमारी केवल आईवॉश था पार्टी में पैरवी और किसी बड़े नेता के सिफारिश ही ज्यादा महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि पूर्वी सिंहभूम सहित अन्य जिलों में भी इस बार यही देखने को मिला. उनका कहना था कि जब मनोनित ही करना तो रायशुमारी का नाटक करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी. अब तक तो यही होता आया है. पार्टी को कोई बड़ा नेता अपने चहेते को ही पार्टी का अध्यक्ष बनाता रहा है. इस बार भी वहीं हुआ है. उन्होंने कहा कि एक तरफ राहुल गांधी फेयर इलेक्शन की बात करते है, वहीं उनकी पार्टी में ही उनके विचार के ठीक उल्ट काम किया जाता है. ऐसे में पार्टी कैसे और कितना मजबूत हो पाएगा यह अपने आप में बड़ा सवाल है. 


पांच दशक में पहली बार सिख बना जिला अध्यक्ष

पूर्वी सिंहभूम कांग्रेस के इतिहास में पहली बार कोई सिख समुदाय से जिला अध्यक्ष( परविंदर सिंह) बना है. अभी तक जिला अध्यक्ष पद पर स्वर्ण जाति का ही वर्चस्व रहा है. पहली बार पार्टी ने हिम्मत दिखाते हुए सिख समुदाय से परविंदर सिंह को जिला अध्यक्ष बनाया है. जहां परिवंदर सिंह के कंधों पर पार्टी व संगठन को पंचायत स्तर पर मजबूती प्रदान करने की एक बड़ी जिम्मेवारी है वहीं उनके समक्ष विरोधियों को साथ लेकर चलने की चुनौती भी है. 1984 के बाद से सिख समुदाय ने कांग्रेस पार्टी से दूरी बना ली थी. जबकि 1984 से पहले सिख सुदाय को कांग्रेस के एक मजबूत वोट बैंक के तौर पर देखा जाता था. पिछले दिनों मोदी सरकार द्वारा किसान आंदोलन को जिस प्रकार से कुचने का प्रयास किया गया. इससे सिख समुदाय बीजेपी से नाराज चल रहे है. परविंदर सिंह के पास एक मौका है कि एक बार वो फिर से सिख समुदाय को कांग्रेस पार्टी से जोड़े इसमें वो कितना सफल हो पाते है यह देखना होगा. हालांकि विगत झारखंड विधानसभा चुनाव में जमशेदपुर पूर्वी से कांग्रेस के प्रत्याशी डा. अजय कुमार के पक्ष में सिख समुदाय ने वोट कर अपना समर्थन दिया था.

कार्यकर्ता कर रहें है विरोध

 परविंदर सिंह को पूर्वी सिंहभूम कांग्रेस का जिला अध्यक्ष बनाए जाने पर पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध जारी है. उनका कहना है कि यदि उनकी बातें नहीं सुनी गई तो वे आंदोलन व पूतला दहन कर अपना विरोध दर्ज कराएंगे. कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रदेश अध्यक्ष औऱ प्रदेश प्रभारी द्वारा उनका फोन रिसिव नहीं किया जा रहा है. पार्टी के वरीय नेताओं पर कार्यकर्ताओं की अनदेखी की बात कही जा रही है. कार्यकर्ताओं की मांग है कि पर्वेक्षक द्वारा जो सूची पार्टी आलाकमान को भेजी गई है उसको सार्वजनिक की जाए ताकि इस बात का खुलासा हो सके कि किस आधार पर जिला अध्यक्ष की नियुक्ति की गई है. अब देखना होगा कि पार्टी में मचा बवाल पर आलाकमान क्या निर्णय लेते है ? कहीं घमासान पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित ना हो जाए. घाटशिला में उप चुनाव होना है ऐसे में पार्टी की इस अंदरुनी खिंचतान का कितना असर चुनाव पर पड़ेगा यह भी देखना दिलचस्प होगा.

Sunday, October 5, 2025

क्या बिहार में नया सोशल केमिस्ट्री गढ़ पाएंगे प्रशांत किशोर या वोटकटवा बनकर रह जाएंगे? -- धर्मेंद्र कुमार




पटना। वर्तमान समय में बिहार की राजनीति की चर्चा हो और प्रशांत किशोर की बात ना हो तो चर्चा अधूरी व बेमानी ही होगी. चुनाव में जन सुराज को कितनी सीटें मिलेंगी यह तो भविष्य के गर्भ में हैं. लेकिन यह भी सच है कि बिहार में प्रशांत किशोर राजनीति चर्चा के केंद्र बिंदू बने हुए हैं. उन्होंने प्रदेश के समग्र विकास के लिए बिहार की पारंपरिक जातिगत राजनीति से अलग एक नए राजनीतिक प्रयोग करने का जो जोखिम उठाया हैं उसकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है. यदि बिहार की जनता ने जन सुराज का साथ दिया तो उम्मीद की जा सकती है बिहार आने वाले समय में विकास के एक नए मॉडल के तौर पर उभरेगा. हाल के सी-वोटर सर्वे में तेजस्वी यादव 35% लोकप्रियता के साथ शीर्ष पर हैं, जबकि प्रशांत किशोर 23% के साथ दूसरे स्थान पर उभरते दिख रहे हैं. यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि दोनों प्रमुख गठबंधनों एनडीए और महागठबंधन के लिए चिंता का कारण भी बनता जा रहा है. प्रशांत के अनुसार पिछले तीन वर्षों में लगभग 1.5 करोड़ लोग जन सुराज पार्टी से जुड़े है. जिसमें 45 लाख लोगों ने 10रुपया देकर पार्टी की विधिवत सदस्यता ग्रहण की है. जो पार्टी को एक मजबूत आधार प्रदान करता है. इसी आधार पर वे बिहार के 243 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा भी करते हैं.

प्रशांत किशोर पर सेल कंपनियों से पैसे लेने का आरोप
भाजपा जदयू एवं राजद और कांग्रेस के नेताओं पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे प्रशांत किशोर पर भी सेल कंपनियों से पैसे लेने का आरोप सत्ता पक्ष द्वारा लगाया जा रहा है. जिस नवयूगा इंजीनियरिंग कंपनी से पैसे लेने की बात की चर्चा है. उस कंपनी पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं. हालांकि किशोर ने साफ तौर पर कहा है कि मैंने आपना आय व्यय का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक कर दिया है. यदि किसी को कोई संदेह हैं तो इसकी जांच करवा ले मैं तैयार हूं.
  जन सुराज की चुनौती: जाति बनाम जनमत
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी  ने राजनीति में एक वैकल्पिक विमर्श खड़ा करने की कोशिश की है. उनके अनुसार जहां जातिगत समीकरणों से ऊपर उठकर विकास और सुशासन की बात हो. लेकिन बिहार की राजनीति में जाति एक स्थायी तत्व रही है. किशोर स्वयं मानते हैं कि जातिगत सोच से ऊपर उठना आसान नहीं है, और यही उनकी सबसे बड़ी चुनौती भी है. उपचुनावों में जन सुराज को अब तक कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली है. 2023 के उपचुनावों में पार्टी को 1.2% से भी कम वोट मिले, जो दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर पार्टी की पकड़ अभी कमजोर है. यहां महत्वपूर्ण  सवाल यह है कि क्या जन सुराज भी जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखकर टिकट बांटेगी? यदि ऐसा होता है, तो पार्टी का वैकल्पिक नैरेटिव कमजोर पड़ सकता है. सी-वोटर सर्वे के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि प्रशांत किशोर को जनता सुन रही है, लेकिन क्या वह वोट में तब्दील होगा? यह सवाल अभी अनुत्तरित है.
 सोशल केमिस्ट्री 
यदि किशोर जाति से ऊपर उठकर एक सामाजिक केमिस्ट्री  बना पाते हैं, जहां युवा, महिलाएं, और ग्रामीण मतदाता उन्हें एक विकल्प के रूप में देखें तो वे सत्ता के समीप पहुंच सकते हैं. लेकिन यदि यह समर्थन बिखरा रहा, तो वे सिर्फ वोटकटवा बनकर रह जाएंगे, जिससे किसी दूसरे गठबंधन को अप्रत्याशित लाभ मिल सकता है. 
प्रशांत किशोर की राजनीति एक प्रयोग है. जो बिहार की पारंपरिक राजनीति को चुनौती देता है. लेकिन यह प्रयोग तभी सफल होगा जब जनता जातिगत खांचे से बाहर निकलकर विकास, पारदर्शिता और सुशासन के साथ ही बिहार के समग्र विकास को प्राथमिकता दे. जन सुराज पार्टी के लिए यह चुनाव सिर्फ एक राजनीतिक परीक्षा नहीं, बल्कि एक वैचारिक कसौटी भी है. वैसे राजनीति को संभावनाओं का खेल कहा जाता है. लोकतंत्र में जनता ही मालिक है. क्योंकि तमाम भविष्यवाणी और आकलनों के ठीक उलट नतीजे ने यह साबित किया है कि जनता जिसको चाहेगी वहीं सत्ता के शिखर पर होगा.

Saturday, October 4, 2025

विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोट का गणित क्या बदलेगा सत्ता का समीकरण? ✍️ ध्रर्मेंद्र कुमार


पटना। बिहार की राजनीति में मुस्लिम मतदाता लंबे समय से एक निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं. एक बार फिर बिहार की राजनीति मुस्लिम वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमती दिख रही है. जहां इंडिया गठबंधन मुस्लिम वोट के प्रति आश्वस्त दिख रहा है वहीं एनडीए ने घुसपैठ जैसे मुद्दे के आसरे हिंदु वोट को साधने का प्रयास शुरु कर दिया है. इन सबके बीच ओवैसी ने सीमांचल के 20 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर इंडिया गठबंधन की चिंता बढ़ा दी है. इस बार के चुनाव में सीमांचल से सत्ता में हिस्सेदारी और नेतृत्व की मांग उठने लगी है जो सिर्फ आश्वासन एवं वादे से दबाया नहीं जा सकता. राज्य की लगभग 18% मुस्लिम आबादी, विशेषकर सीमांचल क्षेत्र में, 2025 के विधानसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकती है. कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया और अररिया जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाता 40–70% तक हैं, और इनकी लगभग 20 सीटों पर सीधा प्रभाव है. जिलावार विधानसबा सीटों की बात करें, तो किशनगंज जिला के तीन विधानसभा सीट किशनगंज, बहादुरगंज, ठाकुरगंज सीट, अररिया के नरपतगंज, जोकीहाट, अररिया, सिकटी विधानसभा वहीं पूर्णिया के अमौर, बैसी, कदवा, पूर्णिया और कटिहार जिला के कटिहार, बलरामपुर, बरारी, मनिहारी विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता की आबादी की बहुलता सीधे तौर पर निर्णायक होती है. इसके अलावा दरभंगा की केवटी, बहादुरपुर, हायाघाट और  मधुबनी की फुलपरास, खजौली सीटों पर मुस्लिम मतदाता फैक्टर रहा है. इतनी ही नहीं गया जिला के वजीरगंज, इमामगंज और सीवान के दरौंधा, रघुनाथपुर विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की आबादी सीमांचल की अपेक्षाककृ कम है बावजूद इसके इन सीटों पर भी मुस्लिम मतदाताओं का प्रभाव रहता है.

किसे कितना मिला वोट
बिहार में मुस्लिम वोट की बात करें तो 2015 में राजद,जदयू और कांग्रेस गठबंधन को फायदा मिला था. इस गठबंधन को लगभग 85 प्रतिशत मुस्लिम वोट मिले थे. वहीं एनडीए के बीजेपी,एलजेपी व अन्य गठबंधन को लगभग 7 प्रतिशत वोट पर ही संतोष करना पड़ा था. जबकि 2020 में जब जदयू एनडीए में शामिल हो कर चुनाव लड़ा तो मुस्लिम वोट में 5 प्रतिशत का इजाफा हुआ और एनडीए को कुल 12 प्रतिशत मुस्लिम वोट मिला. वहीं इंडिया गठबंधन को 8 प्रतिशत का नुकसान हुआ और 77 प्रतिशत वोट मिला था. वहीं ओवैसी की पार्टी ने 11 प्रतिशत वोट प्राप्त कर सीमांचल की 5 सीटों पर जीत हासिल की. इस बार ओवैसी सीमांचल की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की बात कर रहे हैं. यदि ओवैसी सीमांचल के 20 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारते है तो मुस्लिम वोट का बिखरना तय माना जा रहा है. जानकारों की माने तो इसका असर पूरे बिहार चुनाव में दिखेगा. ऐसे में सीधा नुकसान तो इंडिया गठबंधन को होता दिख रहा है. 

ओवैसी ने बढ़ाई परेशानी

2020 में AIMIM ने सीमांचल की 5 सीटें जीतकर यह साबित किया कि मुस्लिम नेतृत्व की मांग को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. बावजूद इसके, बार-बार आग्रह के बाद भी ओवैसी की पार्टी को इंडिया गठबंधन में शामिल नहीं किया जाने से सीमांचल में ओवैसी का पक्ष मजबूत होता दिख रहा है. इस संबंध में गठबंधन के नेताओं का तर्क था कि AIMIM की मौजूदगी से वोटों का ध्रुवीकरण होगा, वहीं ओवैसी ने इसे "मुस्लिम नेतृत्व को नकारने की साजिश" बताया है और सीमांचल की सभी मुस्लिम बहुल सीटों पर प्रत्याशी उतारने का ऐलान किया है. लेकिन सीमांचल की राजनीति केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है. बल्कि यहाँ की जनता भावनात्मक और आध्यात्मिक अभिव्यक्तियों से जुड़ी है. ओवैसी की भाषण शैली और सांस्कृतिक जुड़ाव इस भावभूमि को छूते हैं, जबकि INDIA गठबंधन इस पहलू को नज़रअंदाज़ करता दिख रहा है. इससे वोटों के विभाजन की आशंका है, जिससे राजद-कांग्रेस को नुकसान और एनडीए को अप्रत्यक्ष रुप से लाभ मिल सकता है. जाहिर तौर पर यदि 20 सीटें प्रभावित होंगी तो इसका सीधा लाभ एनडीए को मिलेगा और इंडिया गठबंधन सत्ता से दूर रह जाएगा.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या गठबंधन की रणनीतिक चूक सीमांचल में भारी पड़ेगी? क्या ओवैसी की भावनात्मक अपील मुस्लिम मतदाताओं को संगठित कर पाएगी? और क्या सांस्कृतिक-सामाजिक जुड़ाव को नज़रअंदाज़ करना राजनीतिक नुकसान का कारण बनेगा?
2025 का चुनाव इन सवालों के जवाब देगा. लेकिन इतना तय है कि सीमांचल की राजनीति अब केवल जाति और विकास की बात नहीं है बल्कि यह भावनाओं, नेतृत्व की पहचान और सांस्कृतिक आत्मसम्मान की भी लड़ाई बन चुकी है. वैसे चुनाव संभावनाओं का खेल है अंतिम समय जनता क्या निर्णय करती है यह उसके विवेक पर निर्भर करता है. कई बार जनता ने तमाम विशेषज्ञों की भविष्यवाणी को पलट कर रख दिया है. तो थोड़ा करिए इंतजार, नमस्कार.

Thursday, October 2, 2025

विजयादशमीः पूतले का दहन पर्याप्त नहीं, अपने अंदर के रावण को मारना होगा धर्मेंद्र कुमार


विजयादशमी, जिसे दशहरा भी कहा जाता है, भारतीय संस्कृति में बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है. हर वर्ष रावण के विशालकाय पुतले का दहन कर हम प्रतीकात्मक रूप से अधर्म का अंत करने का ढ़ोंग मात्र करते है. रावण के पूतले को जलाकर हम यह मान लेते हैं कि रावण के जलने के साथ ही समाज से बुराईयों का सफाया हो गया लेकिन क्या यह पूरा सच है शायद नहीं. जबकि आप पाएंगे कि समाज में लगातार अत्याचार, हत्या और बलात्कार जैसी घटनाओं में वृद्धि दर्ज की जा रही है. यहां महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब हम प्रत्येक वर्ष विजयादशमी के दिन रावणों का दहन करते है. फिर यह समाज में रावण रुपी अत्याचारी कहां से पैदा हो रहे है. मतलब साफ है कि केवल बाह्य रावण का दहन ही पर्याप्त नहीं है, समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान केवल उत्सवों व प्रतिकों को जलाने से संभव नहीं. बल्कि हमें अपने अंदर के रावण( लोभ,हवस, नफरत,अंहकार, दुराचार) को समाप्त करना होगा. तभी स्वस्थ और समृद्ध समाज का निर्माण हो पाएगा.

  अवगुण ही रावण के अंत का कारण बना

शास्त्रों के ज्ञाता रावण को वेदों, आयुर्वेद, संगीत और ज्योतिष का गहन ज्ञान था. शिव तांडव स्तोत्र जैसी रचनाएँ उसकी साहित्यिक प्रतिभा का प्रमाण हैं. पुष्पक विमान, जो इच्छानुसार उड़ सकता था, रावण की तकनीकी दक्षता और वैज्ञानिक सोच का प्रतीक माना जाता है. वहीं सोने की लंका केवल भौतिक समृद्धि नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित और उन्नत राज्य व्यवस्था का संकेत देती है. इन सबके बावजूद, रावण का पतन हुआ क्योंकि रावण ने अपने ज्ञान और शक्ति को आत्ममुग्धता में बदल दिया. यही उसका सबसे बड़ा शत्रु बना. सीता हरण केवल एक स्त्री का अपहरण नहीं था, बल्कि धर्म और मर्यादा की अवहेलना थी. रावण ने सत्ता को साधन नहीं, स्वार्थ का लक्ष्य बना लिया. यही उसकी नियति को विनाश की ओर ले गया. 
 
रावण अभी जिंदा है
 
रावण एक व्यक्ति नहीं, एक मानसिकता है. आज का समाज साधन-संपन्न होने के साथ ही उसमें विभिन्न प्रकार की बुराईयां का भी समावेश हैं. भारत में 2025 तक इंटरनेट उपयोगकर्ता 85 करोड़ से अधिक हो चुके हैं. तकनीकी क्षेत्र में भारत विश्व के अग्रणी देशों में है. शिक्षा और स्वास्थ्य में निरंतर सुधार हो रहा है. इसके बावजूद समाज में अहंकार और स्वार्थ की राजनीति हावी है. लिंगभेद, जातिवाद और भ्रष्टाचार जैसी सामाजिक बुराइयाँ चरण पर हैं. स्वस्थ समाज का निर्माण केवल बाह्य प्रतीकों से नहीं, बल्कि आंतरिक सुधार से होगा. क्या हमारा उद्देश्य समाज का कल्याण है या केवल व्यक्तिगत लाभ? क्या हम दूसरों की भलाई के लिए खड़े भी होते हैं? 
विजयादशमी केवल एक पर्व नहीं, बल्किन एक आह्वान है, अपने अंदर के रावण (बुराईयों, अहंकार) को पहचानने और उसे पराजित करने का. जब हम अपने भीतर की बुराइयों को खत्म करेंगे, तभी एक न्यायपूर्ण, समृद्ध और स्वस्थ समाज का निर्माण संभव होगा. विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं.