नारी शक्ति वंदन – संकल्प या सिर्फ़ चुनावी लॉलीपॉप ? धर्मेंद्र कुमार

भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाला नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 ऐतिहासिक कदम कहा गया। लेकिन यह कदम ज़्यादा ‘पोस्ट-डेटेड चेक’ साबित हुआ। आधी आबादी को उम्मीद की चाबी थमा दी गई, मगर ताला 2034 से पहले खुलने का नाम नहीं लेता।

तालियों से लेकर ठंडे बस्ते तक

20 सितंबर 2023 को संसद ने सर्वसम्मति से इस बिल को पास किया और 27 सितंबर को राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दिया। भाजपा को लगा कि इस अधिनियम के सहारे वह 2024 की चुनावी वैतरणी पार कर लेगी। लेकिन सजग महिलाओं ने उन्हें ‘ठेंगा’ दिखा दिया। नतीजा—2024 में अपेक्षित सफलता नहीं मिली और कानून ठंडे बस्ते में चला गया।
2026 में जब पाँच राज्यों के चुनावी रण में सभी दल व्यस्त थे, तभी सरकार को अचानक याद आया कि महिलाओं को आरक्षण देना ज़रूरी है। आनन-फानन में 16,17 और 18 अप्रेल को तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाकर तीन विधेयक पेश किए गए:
• 131वां संविधान संशोधन विधेयक – लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850।
• परिसीमन विधेयक – राज्यों में नई सीटों का निर्धारण।
• केंद्र शासित प्रदेश संशोधन विधेयक – दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी में महिलाओं को आरक्षण।
विपक्ष ने साफ कहा—“यदि सरकार की नियत साफ है तो मौजूदा 543 सीटों में ही 33% आरक्षण लागू कर दीजिए, हम समर्थन देंगे।” लेकिन सरकार की मंशा लागू करने की नहीं, बल्कि लटकाने और विपक्ष पर ठीकरा फोड़ने की थी।

कानून की असलियत

कानून कहता है कि पहले जनगणना होगी, फिर परिसीमन होगा, तब जाकर 2029 में महिलाएँ 181 सीटों पर लड़ पाएँगी। जनगणना 2027 तक, परिसीमन 2028 में और उसके बाद चुनाव। यानी 2023 में तालियाँ बटोरने वाला कानून 2029 तक कागज़ पर ही रहेगा। इसे ‘लॉलीपॉप’ न कहें तो क्या कहें?

अधूरा न्याय

33% में SC/ST महिलाओं को हिस्सा मिला, पर OBC बहनें कहाँ गईं? देश की 60% आबादी की महिलाओं को कानून ने छुआ तक नहीं। राज्यसभा और विधान परिषद को भी बाहर रखा गया—जहाँ असली नीति बनती है, वहाँ महिलाओं की हिस्सेदारी 13% ही रहेगी। यह कैसा सशक्तिकरण, जो आधे रास्ते में ही दम तोड़ दे? नारी शक्ति वंदन अधिनियम का नाम जितना भव्य है, उसका असर उतना ही खोखला। यह अधिनियम महिलाओं के सशक्तिकरण का संकल्प है या सिर्फ़ चुनावी लॉलीपॉप—यह सवाल जनता के सामने है। सरकार ने आधी आबादी को उम्मीद का सपना दिखाया, लेकिन उसकी ‘एक्सपायरी डेट’ 2029 लिख दी।

सरकार की मंशा

सिंतबर 2023 में संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के पास होने के साथ ही इसको लागू करने लिए जनगणना का कार्य की शुरुआत करनी चाहिए थी लेकिन मजे की बात यह है कि इस अधिनियम के कानून बनने के बाद इसको नोटिफाई 2026 में किया गया। इससे इश कानून को लागू करने की सरकार की मंशा साफ है। संसद में मुहंकी खाने के बाद सरकार इसको लेकर विपक्ष को घेरने का प्रयास किया लेकिन देश की आधी आबादी बहुत ही समझदार है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विधानसभा एक निंदा प्रस्ताव लाया गया जिस पर चर्चा हुई। विपक्ष का स्पष्ट तोर पर कहना है कि सरकार की नियत साफ है तो 543 में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू कर दो हम समर्थन देने को तैयार है।
1996 से लटका बिल पास होना अपने-आप में क्रांति है। 454-2 का बहुमत बताता है कि देश की सियासत मन से तैयार है। पंचायतों में 14.5 लाख महिलाएं आज नेतृत्व कर रही हैं - वही मॉडल संसद में दोहराया जाए तो तस्वीर बदल सकती है। यदि पार्टियां नैतिक जिम्मेदारी लेकर कानून का इंतजार किए बिना ही चुनाव में 33% टिकट महिलाओं को दें। 
नारी शक्ति वंदन अधिनियम ‘ऐतिहासिक’ तभी बनेगा जब वह ‘तत्काल’ बने। वरना आने वाली पीढ़ी इसे किताबों में ‘चुनावी लॉलीपॉप’ के नाम से ही पढ़ेगी। संकल्प को सिद्धि में बदलने के लिए नीयत के साथ ‘तारीख’ भी चाहिए। वरना ताली दोनों हाथ से नहीं बजती - एक हाथ कानून का है, दूसरा सरकार की इच्छाशक्ति का। फिलहाल, आधी आबादी इंतजार कर रही है। सवाल बस इतना है: इंतजार कब तक?

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