भारतीय लोकतंत्र में दल बदल कोई नई घटना नहीं है। पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल हुए। इससे पहले कांग्रेस और अन्य दलों के कई सांसद व विधायक भी अपनी पार्टी छोड़कर दूसरे दलों में जा चुके हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या होता है कि राजनेता वर्षों तक जिस पार्टी में रहे, जहां उन्हे मान-सम्मान मिला, उसी पार्टी को अचानक "गलत" बताकर नेता रातों-रात दूसरी पार्टी में चले जाते हैं। तब उनके लिए नैतिकता, नीति और सिद्धांत कोई मायने नहीं रखता, ना ही उन्हें जनता की कोई फिक्र होती है, जिसने उनपर भरोसा किया और उन्हें सदन तक पहुंचाया। यह केवल राजनीतिक अवसरवाद नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ है। वर्तमान परिपेक्ष्य में नेताओं के लिए उनका निजी हित और स्वार्थ ज्यादा महत्वपूर्ण है।
किसने कब मारी पल्टी
1985 में दल बदल रोकने के लिए दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) लागू हुई। लेकिन नेताओं का दल बदलने का सिलसिला कभी रुका नहीं। हाल की कुछ घटनाओं की अगर बात करें तो 2019 में कर्नाटक 17 विधायकों ने सामूहिक इस्तीफा देकर कांग्रेस-जेडीएस की सरकार गिरा दिया और भाजपा में शामिल हो गए। 2020 में मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस के 22 विधायक भाजपा में शामिल हुए। दिल्ली (2026) – आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल हुए।
क्या कहता है दल बदल कानून
दल बदल कानून कहता है कि यदि कोई सांसद/विधायक अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है। लेकिन यदि दल का एक बड़ा समूह (कम से कम दो-तिहाई) टूटकर दूसरी पार्टी में जाता है, तो यह "विलय" कहलाता है और सदस्यता बच जाती है। इस कानून में कई त्रुटियां हैं जिसके आसरे नेता अपनी सदस्यता बचाने में सफल रहते है। नेता अक्सर पद से इस्तीफा नहीं देते, बल्कि संवैधानिक पद पर बने रहते हुए ही दल बदल करते हैं। विधायक औऱ सांसद की सदस्यता का समाप्त करने का अधिकार सदन के अध्यक्ष पास होता है। यही कारण है कि दल बदल के मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं।
नेताओं का अपने हित साधने के लिए दूसरे दलों में शामिल होना केवल राजनीतिक अवसरवाद नहीं, बल्कि यह जनता के साथ विश्वासघात है। जनता जिस विचारधारा और पार्टी के नाम पर वोट देती है, वही नेता अपनी हीत व सुख सुविधा के लिए उस जनादेश को बदल देता है। भारतीय राजनीति में दल बदल की प्रवृत्ति लोकतंत्र की विश्वसनीयता को कमजोर करती है। यदि किसी नेता को सचमुच लगता है कि वह गलत पार्टी में था, तो उसे सबसे पहले अपने पद से इस्तीफा देकर जनता के सामने जाना चाहिए। लेकिन ऐसा शायद ही कभी होता है। लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए ज़रूरी है कि दल बदल कानून को और कठोर बनाया जाए, ताकि जनादेश का सम्मान हो और राजनीति में "गद्दारी" की जगह "निष्ठा" को महत्व मिले।
No comments:
Post a Comment