Wednesday, April 22, 2026

क्या भाजपा बंगाल में करेगी किला फतह या करना होगा थोड़ा और इंतजार — धर्मेंद्र कुमार



आईविजन। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के कारण प्रदेश का राजनीतिक तापमान काफी बढ़ गया है। पिछले 15 वर्षों से बंगाल की राजनीति तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के इर्द-गिर्द घूमती रही है। 2021 विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने 215 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया था, जबकि भाजपा ने 77 सीटों पर कब्ज़ा जमाया और स्वयं को बंगाल में एक मज़बूत विपक्ष के रूप में स्थापित किया।
2021 के विधानसभा चुनाव में वोट प्रतिशत की बात करें तो टीएमसी को 48.02 प्रतिशत, भाजपा को 38.15 प्रतिशत और कांग्रेस को 2.94 प्रतिशत वोट मिले थे। लेकिन कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई। वोट प्रतिशत के दृष्टिकोण से देखें तो टीएमसी और भाजपा में लगभग 10 प्रतिशत का अंतर था। यही अंतर भाजपा को सत्ता से दूर रखने में सबसे बड़ी बाधा बना।

वर्तमान परिदृश्य (2026)

बंगाल की सत्ता पर टीएमसी की मजबूत पकड़ है और विशेषकर मुस्लिम वोट बैंक उसका स्थायी आधार बना हुआ है। ममता सरकार ने स्वास्थ्य और शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया, जिससे आम लोगों को राहत मिली। सरकारी योजनाओं का लाभ हर वर्ग तक पहुँचाने की कोशिश भी की गई। हालांकि रोजगार सृजन के मामले में सरकार कहीं न कहीं असफल रही, बावजूद इसके बंगाल की जनता की पहली पसंद अब भी ममता ही हैं।
दूसरी ओर भाजपा बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और घुसपैठ जैसे मुद्दों को लेकर चुनावी मैदान में उतरी है।

चुनाव आयोग की तैयारी

केंद्रीय चुनाव आयोग 2026 का विधानसभा चुनाव निष्पक्ष कराने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों का बड़े पैमाने पर फेरबदल और अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती से स्पष्ट है कि आयोग इस बार किसी भी प्रकार का जोखिम उठाने के मूड में नहीं है। वहीं समय पर एसआईआर को पूरा कराने के लिए आयोग ने जजों की नियुक्ति भी की है, ताकि उसकी निष्पक्षता पर कोई सवाल न उठ सके।

भाजपा की रणनीति
भाजपा का शीर्ष नेतृत्व जानता है कि बंगाल में सत्ता तक पहुँचने के लिए 2021 के लगभग 10 प्रतिशत वोट अंतर को समाप्त करना होगा। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम मतदाता लगभग 27% हैं और उनका प्रभाव 70–85 विधानसभा सीटों पर निर्णायक माना जाता है।
2021 चुनाव में इन मुस्लिम-बहुल सीटों में से लगभग 85 पर मुकाबला हुआ था, जिनमें से टीएमसी ने 75 सीटें जीती थीं। ऐसे में वोट अंतर को समाप्त किए बिना भाजपा के लिए सत्ता तक पहुँचना कठिन है।
एसआईआर के दौरान 10 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं के नाम काटे गए। चुनाव आयोग के आँकड़ों से स्पष्ट है कि सीमावर्ती जिलों—कूचबिहार, उत्तर दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया और उत्तर व दक्षिण 24 परगना—में सबसे अधिक नाम हटाए गए हैं। कहा जा रहा है कि इनमें से अधिकांश वोटर टीएमसी समर्थक थे। इसका सीधा असर चुनाव पर पड़ेगा और संभावना है कि भाजपा को इसका लाभ मिल सकता है। यदि ऐसा हुआ तो भाजपा बंगाल में सरकार बनाने में सफल हो सकती है।
राजनीति में कुछ भी संभव है। 2026 का विधानसभा चुनाव टीएमसी के लिए अग्नि परीक्षा है, वहीं भाजपा के लिए यह अवसर है कि वह वोट अंतर को कम करके सत्ता तक पहुँचने की कोशिश करे।

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