झाड़ग्राम की झालमुड़ी ने ऐसा तूफ़ान खड़ा कर दिया कि बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और महँगाई जैसे मुद्दे अब कहीं पीछे छुट गए हैं। अब चुनावी बहस का नया एजेंडा बन गया है—झालमुड़ी का स्वाद और उसकी प्लेटिंग! महंगाई के इस दौर में भी कम कीमत में झालमुड़ी आपके मुंह का स्वाद बदल सकता है। झालमुड़ी में मुख्य रुप से मुड़ी और मसालों का इसतेमाल किया जाता है। मुड़ी जिसे बिहार में भुंजा या चबेनी वहीं दिल्ली, गुजरात में मुरमुरा भी कहा जाता है। आज के दौर में झालमुड़ी राज्यों के दायरे से उपर उठ कर सर्वव्यापी हो गया है। जहां मुड़ी बंगाल के कल्चर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वहीं ओड़िशा में मुड़ी के साथ घुघनी या छोले और पकोड़े नाश्ते के तौर पर लोग खाना पसंद करते है।
ममता दीदी की मिर्ची
प्रधानमंत्री मोदी के चटकारे लेते ही ममता दीदी का पारा चढ़ गया। उन्होंने इसे “स्क्रिप्टेड ड्रामा” करार दिया और आरोप लगाया कि कैमरा पहले से फिट था, झालमुड़ी भी SPG के जवान से बनवाई गई। यानी अब बंगाल की राजनीति में झालमुड़ी भी सुरक्षा कवच में लिपटी हुई है।
भाजपा का नमकीन जवाब
भाजपा समर्थक इसे जनता से जुड़ाव बताते हैं। लेकिन विपक्ष का तंज़ है—“जनता से जुड़ना है तो झालमुड़ी खाकर नहीं, महँगाई घटाकर और बेरोज़गारी मिटाकर जुड़िए।” जनता सोच रही है कि अगर रोज़गार मिल जाए तो झालमुड़ी भी रोज़ खाई जा सकती है।
हेलिकॉप्टर बनाम झालमुड़ी
तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि पीएम के झालमुड़ी ब्रेक की वजह से हेमंत सोरेन का हेलिकॉप्टर हवा में ही मंडराता रह गया। अब लोकतंत्र का सवाल यह है—हेलिकॉप्टर की लैंडिंग ज़्यादा अहम है या झालमुड़ी की प्लेटिंग?
मुफ़्त झालमुड़ी योजना?
झालमुड़ी अब राष्ट्रीय मुद्दा बन चुकी है। जनता उम्मीद लगाए बैठी है कि अगली बार चुनावी घोषणापत्र में “मुफ़्त झालमुड़ी योजना” भी शामिल होगी। अगर यही रफ़्तार रही तो संसद के अगले सत्र में “मुफ़्त झालमुड़ी योजना” लागू करने को लेकर सत्ता एवं विपक्ष बहस करते हुए दिखेंगे। जहां सत्ता पक्ष कहेगा “झालमुड़ी सबको मिलेगी”, वहीं विपक्ष अपने अंदाज में तंज़ कसेगा “ झालमुड़ी में नमक कम है, मिर्च ज़्यादा है”।
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