ममता की सोशल इंजीनियरिंग में क्या भाजपा कर पाएगी सेंधमारी ?--धर्मेंद्र कुमार


24 घंटों के बाद पश्चिम बंगाल में किसकी सरकार बनेगी यह स्थिती स्पष्ट हो जाएगी। पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से सामाजिक समीकरणों और सांस्कृतिक अस्मिता पर टिकी रही है। पहले वामपंथियों ने मुस्लिम एवं ग्रामीण जनता को अपने वोट बैंक के तौर पर संगठित एवं संरक्षित किया और उसी वोट बैंक के आसरे तीन दशकों तक बंगाल पर शासन किया। ममता ने उसी  परंपराओं को आगे बढ़ाया। ममता बनर्जी ने अपने तीन कार्यकालों में जिस तरह से सोशल इंजीनियरिंग  का ताना-बाना बुना है, वह तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी ताक़त बन चुका है। मुस्लिम वोट बैंक, ग्रामीण महिलाओं के बीच लोकप्रिय योजनाएं, और स्थानीय पहचान को मज़बूती से जोड़कर उन्होंने एक ऐसा सामाजिक गठजोड़ तैयार किया है जो भाजपा के लिए चुनौती बना हुआ है।

ममता की सोशल इंजीनियरिंग

ममता ने जहां ‘कन्याश्री’ और ‘रूपश्री’ जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच गहरी पैठ बनाई है। वहीं मुस्लिम समुदाय का बड़ा हिस्सा अब भी तृणमूल के साथ मज़बूती से खड़ा है। ममता ने  बंगाल की संस्कृति, भाषा और स्थानीय गौरव को चुनावी विमर्श में लगातार प्रमुखता दी है।

भाजपा की रणनीति

भाजपा ने बंगाल में अपनी पकड़ मज़बूत करने के लिए अप्रत्यक्ष रुप से चुनाव आयोग सहित कई संवैधानिक एजेंसियों का खुलकर प्रयोग किया। इस रणनीति ने विपक्ष को संस्थागत दबाव के मुद्दे उठाने का मौका भी दिया। भाजपा ने बंगाल की राजनीति को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने के साथ ही हिंदूत्व वोट बैंक की ध्रवीकरण करने कि कोशिश की है। वहीं बीजेपी ने  बेरोज़गारी भत्ता और रोज़गार सृजन के वादों के ज़रिए युवा वर्ग को आकर्षित करने का प्रयास किया। जंगलमहल और उत्तर बंगाल में भाजपा ने सामाजिक असंतोष को भुनाने की रणनीति अपनाई है।

टकराव की स्थिति

ममता की सोशल इंजीनियरिंग का सबसे मज़बूत पहलू यह है कि उन्होंने वोटों का समेकन  किया है, जबकि भाजपा अब भी वोटों का विखंडन  रोकने की चुनौती से जूझ रही है। भाजपा ने 2021 में 77 सीटें जीतकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी, लेकिन 2026 में बहुमत की ओर बढ़ने के लिए उसे ममता के सामाजिक गठजोड़ में सेंध लगानी होगी जो आसान नहीं है।
बंगाल की राजनीति में भाजपा की चुनौती केवल चुनावी नहीं, बल्कि सामाजिक है। जब तक भाजपा ममता की सोशल इंजीनियरिंग को तोड़ने में सफल नहीं होगी, तब तक बंगाल में सत्ता परिवर्तन का सपना अधूरा ही रहेगा। यह चुनाव केवल सीटों का नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों की जंग  है—जहां हर वोट एक पहचान और हर पहचान एक राजनीतिक शक्ति बन चुकी है। एक बात जो महत्वपूर्ण है भाजपाइयों को समझनी होगी कि बंगाल की राजनीति देश के अन्य राज्यों की राजनीति से बिलकुल अलग है। बस इतना समझ लीजिए कि तमाम हथकंडे अपनाने के बाद भी भाजपा बंगाल के लोगों की भावनाओं को पूरी तरह समझने में असफल रही। पूरे देश की जनता की नजरें बंगाल चुनाव के नतीजों पर टिकी है। वैसे राजनीति संभावनाओं का खेल है कुछ भी हो सकता है। बंगाल का जनादेश यह तह करेगा कि भावनाओं की राजनीति भारी पड़ती है या विकास का वादा अपना रंग दिखाता है।

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