आचार्य चाणक्य का नाम सुनते ही मस्तिष्क में एक ऐसी नीति की छवि उभरती है जो राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखती थी। उनकी कूटनीति का केंद्रबिंदु था—राष्ट्र का निर्माण, शत्रुओं से रक्षा और प्रजा का कल्याण। उनके अर्थशास्त्र में राजा का पहला धर्म ‘प्रजा सुखे सुखं राज्ञः’ बताया गया था। यानी राजा का सुख प्रजा के सुख में है। आज के दौर में यह नीति अप्रासंगिक हो गया। राजा के सुख में प्रजा को सुख की अनुभूति करनी होगी यही जनता कि नियति बन चुकी है। जो जनता जनप्रतिनिधियों को पलकों पर बिठा कर सत्ता के सिंहासन पर बैठाती है वहीं सेवक सत्ता के सिंहासन पर पहुंचने के साथ ही स्वंय को प्रजा से असुरक्षित महसुस करने लगता है। और अपनी सुरक्षा के लिए अपनी चारों तरफ अंगरक्षकों की एक घेराबंदी बना लेता है ताकि जनता आसानी से उन तक नहीं पहुंच सके। आज की राजनीति व राजनताओं की कड़वी हकिकत है। दुर्भाग्य से आज की भारतीय राजनीति में जिन ‘चाणक्यों’ का उदय हुआ है, उनकी नीति चाणक्य के सिद्धांतों के ठीक उलट है। इन कलयुगी चाणक्यों के लिए राष्ट्रनिर्माण गौण है, सत्ता ही साध्य है।
विपक्ष-मुक्त लोकतंत्र का खतरनाक खेल
चाणक्य ने कहा था कि मजबूत शत्रु भी राज्य को सतर्क रखता है। लोकतंत्र में विपक्ष वही भूमिका निभाता है। लेकिन आज के चाणक्य की पहली नीति विपक्ष को हर कीमत पर कमजोर करना है। इसके लिए प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, आयकर जैसी संवैधानिक संस्थाओं का राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल आम हो गया है। विपक्षी नेताओं पर छापे, मुकदमे और दल-बदल कराना अब ‘चुनावी रणनीति’ का हिस्सा बन चुका है। मकसद साफ है चुनावी मैदान में उतरने से पहले ही विरोधी को पंगु बना दो। ताकि चुनाव आसानी से जीता जा सके।
संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग
चाणक्य ने राजा को धर्म और न्याय के अधीन रखा था। आज के चाणक्य संविधान और संस्थाओं को अपने अधीन करना चाहते हैं। संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग कर लोकतंत्र को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल, राज्यपालों का राजनीतिक इस्तेमाल, और न्यायपालिका पर दबाव के आरोप अब सामान्य हो गए हैं। जब हार का डर सताए, तो संवैधानिक प्रावधानों की मनमानी व्याख्या करके, अध्यादेश लाकर, या राज्य सरकारों को अस्थिर करके चुनाव जीतना इनकी प्राथमिकता बन गई है। लोकतंत्र की प्रक्रिया बची रहे, भावना मर भी जाए तो परवाह नहीं।
नागरिक नहीं, सिर्फ ‘वोटर टूल’
असली चाणक्य के लिए प्रजा ‘पाल्य’ थी। कलयुगी चाणक्य के लिए जनता महज चुनाव जीतने का ‘टूल’ है। जनता को वास्तविक मुद्दों—महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य—से दूर रखने के लिए उसे धर्म और जाति के आख्यान में उलझा दिया जाता है। सुबह-शाम मंदिर-मस्जिद, श्मशान-कब्रिस्तान की बहस चलाई जाती है ताकि कोई यह न पूछे कि अस्पताल क्यों नहीं बने, नौकरियां कहां गईं, रुपया क्यों गिरा।
विकास का विकल्प ‘रेवड़ी कल्चर’
इन चाणक्यों का विकास से कोई वैचारिक सरोकार नहीं। पांच साल तक बुनियादी ढांचा, रोजगार सृजन, शिक्षा सुधार पर कोई ठोस काम नहीं होता। मगर चुनाव से छह महीने पहले ‘रेवड़ी वितरण’ शुरू हो जाता है। मुफ्त अनाज, नकद हस्तांतरण, बिजली बिल माफी—यह सब ‘लाभार्थी वर्ग’ बनाने की कला है। इसका उद्देश्य जनता को स्वावलंबी बनाना नहीं, बल्कि उसे सरकारी खैरात पर निर्भर रखकर चुनावी वैतरणी पार करना है। यह चाणक्य की ‘कोष वृद्धि’ नीति नहीं, बल्कि ‘कोष लुटाकर सत्ता बचाओ’ नीति है। उनके लिए विकास का सरल विकल्प रेवड़ी कल्चर है जिसका स्वाद जनता को भी भाने लगा है लेकिन जो देश को बर्बादी की और ले जाएगा।
शासन का नया शस्त्र झूठे आश्वासन
चाणक्य कहते थे कि ‘न विश्वसेत् अविश्वस्ते’ यानी अविश्वसनीय पर विश्वास न करो। लेकिन आज के चाणक्य का पूरा खेल ही अविश्वसनीय वादों पर टिका है। हर चुनाव में 2 करोड़ नौकरियां, किसानों की आय दोगुनी, 15 लाख हर खाते में—ऐसे जुमले फेंके जाते हैं। चुनाव बाद इन वादों को ‘चुनावी जुमला’ बताकर भुला दिया जाता है। जनता की स्मृति कमजोर है, यह इनका सबसे बड़ा भरोसा है।
चाणक्य नीति से विश्वासघात
आचार्य चाणक्य ने सत्ता को राष्ट्र का साधन माना था। आज के कलयुगी चाणक्य ने राष्ट्र को सत्ता का साधन बना दिया है। उनके लिए संविधान एक किताब है जिसे जरूरत पर मोड़ा जा सकता है, लोकतंत्र एक प्रक्रिया है जिसे प्रबंधित किया जा सकता है, और जनता एक भीड़ है जिसे भावनाओं में बहाकर वोट में बदला जा सकता है।
यह स्थिति लोकतंत्र के लिए घातक है। जब नीति का लक्ष्य केवल ऐन केन प्रकारेण चुनाव जीतना’ रह जाए, तो राष्ट्रनिर्माण पीछे छूट जाता है। चाणक्य ने मगध को अखंड बनाया था। कलयुगी चाणक्य भारत को विचारों, धर्मों और जातियों में खंड-खंड कर रहे हैं।
जनता को अब तय करना होगा कि उसे नीति एवं सिद्धांत के प्रति समर्पित चाणक्य या जुमलों का जादूगर। क्योंकि जब राजा का सुख प्रजा के दुख में हो, तो लोकतंत्र का महल रेत की दीवारें साबित होता है।
No comments:
Post a Comment