Friday, November 7, 2025

बढ़ता मतदान, बदलता बिहार: 2025 के पहले चरण की लोकतांत्रिक तस्वीर धर्मेंद्र कुमार



बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण में 18 जिलों की 121 सीटों पर 64.66% मतदान हुआ जो पिछले 20 वर्षों के सभी रिकार्ड को धवस्त कर एक नया प्रतिमान स्थापित किया. यह आंकड़ा न केवल पिछले चुनावों की तुलना में अधिक है, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक चेतना, जन-सक्रियता और संभावित सत्ता परिवर्तन की आहट भी देता है. मतदान में हुए इस वृद्धि का आकलन सभी दलों द्वारा अपने अपने पक्ष में बताया जा रहा है. वहीं राजनीतिक जानकार भी मतदान में हुए इस वृद्धि को लेकर स्पष्ट रुप से कुछ भी कहने से बचते दिख रहे है. 

मतदान प्रतिशत में वृद्धि के मायने

राजनीति जानकारों ने बिहार के प्रथम चरण में मतदान प्रतिशत में हुई वृद्धि के कई कारण की चर्चा की. उनका मानना है कि  जनता की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी के कारण वोट प्रतिशत में वृद्धि हुई है. इसमें जहां युवाओं और पहली बार वोट डालने वालों की भागीदारी ने इस प्रतिशत को ऊपर उठाया है. वहीं दूसरी ओर सत्ता विरोधी लहर की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है. यह बदलाव की चाहत या विकल्प की तलाश के कारण भी सकता है. बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे स्थानीय मुद्दों ने मतदाताओं को प्रेरित किया. जानकारों के अनुसार वोट प्रतिशत में वृद्धि का एक प्रमुख कारण मतदान में  महिलाओं की बढ़ती भागीदारी है. कई जिलों में तो महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा. यह सामाजिक जागरूकता और महिला सशक्तिकरण का संकेत है,  2020 में कुल 57.05% मतदान हुआ था जिसमें महिलाओं का मतदान प्रतिशत 59.6% था जबकि पुरुषों का 54.7% था. वहीं  2025 के प्रथम चरण में कुल मतदान 64.66% रहा, जिसमें महिलाओं का मतदान प्रतिशत लगभग 69% और पुरुषों का 61% रहा. 2020 के मुकाबले 2025 में महिलाओं के वोट प्रतिशत में लगभग 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इस बार के चुनाव में महिलाओं ने अपने पुराने रिकार्ड को पीछे छोड़ दिया. इसका मुख्य कारण नीतीश सरकार द्वारा ठीक चुनाव से पहले 1.21 करोड़ महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपये दिया जाना बताया जा रहा है. इस कारण भी एनडीए इसको अपने पक्ष होने का दावा कर रही है और इसमें कुछ तो सत्यता भी है. वहीं दूसरी ओर महागठबंधन वहीं पुराने ढर्रे पर चलते हुए इस बढ़ते हुए वोट प्रतिशत को सरकार के खिलाफ लोगों के गुस्सा को बताया जा रहा है. लेकिन एक बात तो तय है कि यदि यही ट्रेंड दूसरे चरण के मतदान में भी कायम रहा तो एक बात तो स्पष्ट है कि जिस गठबंधन की जीत होगी उसको प्रचंड बहुमत मिलेगा. 
कहां कितना हुआ मतदान
बिहार के बेगूसराय जिला में सबसे अधिक मतदान 67.32% दर्ज की गई वहीं मधेपूरा में 65.74% मुजफ्फरपुर में 65.23% गोपालगंज में 64.96% पटना में 62% बक्सर में 63% भोजपुर में 64% कैमूर में 65% रोहतास में 66% औरंगाबाद में 67% अरवल में 64% सहित अन्य जिलों में भी कमोवेश 60% से अधिक मतदान हुए. कई जिलों में रिकॉर्ड मतदान ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान खींचा है, जहां सामाजिक आंदोलनों और युवा नेतृत्व की भूमिका अहम रही.
 बिहार में बढ़ा हुआ मतदान प्रतिशत लोकतंत्र की मजबूती और जन-जागरण का प्रतीक है. यह संकेत देता है कि मतदाता अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका में हैं. 2025 का यह चुनाव न केवल सीटों का गणित बदलेगा, बल्कि राजनीतिक विमर्श और जन अपेक्षाओं की दिशा भी तय करेगा.

Thursday, November 6, 2025

सरकार के नहीं दोष गोसाई धर्मेंद्र कुमार



गोस्वामी तुलसीदास जी ने सदियों पहले लिख दिया था — "समरथ के नहीं दोष गोसाई." त्रेता युग में राम थे, द्वापर में कृष्ण. और कलियुग में सरकार है. अब सरकार कोई साधारण संस्था नहीं, यह एक चमत्कारी सत्ता है. जो चाह ले तो जनता से थाली ताली बजवा सकती है, दीया जलवा सकती है, मोबाइल की टॉर्च से कोरोना को डरवा सकती है. यह वही सरकार है जो भ्रष्टाचारियों को सत्य हरिशचंद्र बना सकती है और सच बोलने वालों को कालकोठरी में तपस्या का अवसर प्रदान करती है. और यदि सरकार डबल इंजन वाली हो तो फिर वहां कथित रुप से राम राज्य होने की बात कही जाती है. डबल इंजन वाली सरकार में ना खाता ना बही जिधर बुलडोजर चल जाए वही सही. वहां पीड़ितों को न्याय मिले या मिले लेकिन सरकार के खिलाफ बोलने वालो को पुलिस प्रशासन द्वारा निश्चित रुप से पुरस्कृत किया जाता है और पुरस्कार इतना जबर्दस्त मिलता है कि पुरस्कार पाने .वालो के आने वाली सात पीढ़ीयां फिर कभी सपने में भी सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे. अपराधी, वर्तमान समय में बलात्कारी, भ्रष्टाचारी और कलंकी नेता ही कलयुग का कलिंक अवतार माना जाता है.
समर्थता का नया परिभाषा
सब साधन संपन्न सरकार समर्थवान है क्योंकि उसके पास जनता की याददाश्त से तेज़ वाइपिंग पावर है. सरकार समर्थ है क्योंकि वह सवालों को देशद्रोह में बदलने की योग्यता रखती है. वह सवाल को ही झूठा साबित कर उसको खारिज कर देती है. सरकार समर्थ है क्योंकि वह विकास की परिभाषा को रील्स और रैप में बदल चुकी है. अब दोष किसका है? दोष उनका है जो सरकार से सवाल पूछते हैं. दोषी वो हैं जो कहते हैं कि "बेरोजगारी बढ़ रही है", "महंगाई चरम पर है", "लोकतंत्र सिकुड़ रहा है". अरे भाई आप क्यों नहीं समझते है कि सरकार से सवाल पूछना मतलब राष्ट्र से सवाल पूछना क्योंकि सरकार ने यह सिद्ध कर दिया है कि वही राष्ट्र है, और राष्ट्र से सवाल पूछना मतलब राष्ट्रविरोध.
 आत्मनिर्भरता का नया स्वरुप
सरकार ने कहा — "आत्मनिर्भर बनो." तो जनता ने पकोड़े तले, रील्स बनाए, और कुछ ने तो जेल की रोटियों में भी आत्मनिर्भरता खोज ली. अब सरकार ने जनता पर भरोसा नहीं करते हुए स्वंय को आत्मनिर्भर बनाने की राह ढ़ूढ़ निकाली है. सरकार ने इस आत्मनिर्भर प्लान पर काम करना शुरु भी कर दिया है. सरकार ने जनता के वोट को अपने नाम करने का अनोखा तरीका है. इसमें जोखिम बिलकुल भी नहीं सही रहा तो सरकार के पक्ष में और अगर चोरी पकड़ी गई तो संवैधानिंक संस्था की जिम्मेवारी यह प्लान रंग भी ला रहा है. आप सरकार से उम्मीद क्यों करते हैं? क्या सरकार ने सबका ठेका ले रखा है? क्या आपको हर बार बताना पड़ेगा कि सरकार का काम सिर्फ चुनाव जीतना और सरकार चलाना है जनकल्याण करना नहीं?
 लोकतंत्र का नया रंगमंच
संसद अब बहस का नहीं, बहिष्कार का मंच बन चुकी है. मीडिया अब सवाल नहीं पूछता, सरकार की चालीसा गाता है. न्यायपालिका अब न्याय नहीं देती, टिप्पणी से काम चला लेती है. और जनता? जनता अब मेमोरी कार्ड की तरह है. जब तक फॉर्मेट नहीं होती, तब तक पुराने सवालों को याद करती रहती है. इसलिए हे गोसाई, हे भक्तगण, हे आत्मनिर्भर नागरिकों — दोष मत ढूंढो, सवाल मत पूछो, थाली बजाओ, दीया जलाओ, रील बनाओ, सरकार से मिलने वाली रेवड़ीयों का आनंद लीजिए और सरकार को समरथ मानकर उसकी हर लीला को रामलीला समझकर जयकारा लगाइए. क्योंकि — "समरथ सरकार के नहीं दोष गोसाई!" तो प्रेम से समरथ सरकार की जय बोलिए. जय हो.

Wednesday, November 5, 2025

वादों की बारिश में भीगता लोकतंत्र: चुनावी मौसम का विज्ञान ✍️धर्मेंद्र कुमार



जब आसमान बिलकुल साफ नीला हो और बिन बादल  वादों की बारिश हो तो यकिन मानिए वह चुनावी मौसम आगाज़ है. चुनावी मौसम में अक्सर लगातार वादों की बारिश होती रहती है. यह वो बारिश है जिसमें जनता भींगती नहीं है बल्कि वादों कि बारिश की बूंदें कानों के रास्ते दिल तक पहुंच कर गुदगुदी करती हैं, और दिमाग में भ्रम पैदा करती हैं. यह चुनावी मौसम का असर है इसका कोई इलाज नहीं है.
 वादों का मानसून
हर पांच साल में लोकतंत्र के आंगन में एक विशेष प्रकार का मानसून आता है, जिसमें माननीय नेतागण बादलों की तरह गरजते हैं, बिजली की तरह चमकते हैं, और फिर वादों की बौछार करते हैं. इस खुशनुमा चुनावी मौसम की बारिश का अपना ही आनंद है. माननीय लोग वादों की झड़ी लगा देते है और बेचारी जनता इस वादों की बारिश को हमेशा की तरह झेलती है. उसे पता है कि यह चुनावी मौसम की बादों की बारिश से ना तो “हर हाथ को काम मिलता है,” ना ही “हर खेत को पानी,” ना ही “हर जेब में पैसा और हर घर में वाई फाई,” और इतने वर्षों में ना ही “भ्रष्टाचार खत्म हो पाया और ना ही समाज के अंतिम पायदान पर खड़े आम नागरिकों का ही विकास हुआ.” जनता भी इस मौसम की अनुभवी है. वो जानती है कि माननीयों द्वारा आयोजित ये वादों की नकली बारिश दरअसल जनकल्याण के लिए अपितु लोगों को दिगभ्रमित करने के लिए की जाती है.
 चुनावी कैटवॉक
चुनाव मौसम में माननीय नेताओं के फैशन परेड के क्या कहने हैं. माननीय लोग ऐसे सज-धज कर निकलते हैं जैसे हर ओर फैशन शो हो रहा हो. कोई टोपी बदलता है, कोई रंग तो कोई पार्टी ही बदल देता है. भाषणों में "गरीबों का मसीहा" बनने की होड़ लग जाती है. और जनता? वो हर बार उम्मीद करती है कि “इस बार शायद सचमुच कुछ बदले,” बदलाव तो होता है लेकिन सिर्फ नारों में. अफसोस जनता हर बार छली जाती है. यही लोकतंत्र कि विशेषता है कि जिसके दम पर लोकतंत्र जीवित है उसी लोकतंत्र में तंत्र हमेशा लोक पर हावी रहता है. 
वादों की प्रयोगशाला
नेताओं के पास एक गुप्त लैब होती है, जहां काफी जांच परख के बाद वादों को तैयार किया जाता है. वहां से निकलते हैं.  त्वरित विकास के कैप्सूल, मुफ़्तख़ोरी बम व मुफ्त की रेवड़ी योजनाएं, धर्मनिरपेक्ष सिरप और राष्ट्रवाद का नूडल्स . इनका सेवन करने से जनता को कुछ समय के लिए लोकतंत्र का स्वाद आता है, लेकिन बाद में पेट में मरोड़ और पछतावा होता है.
 जनता का जादू
फिर भी, सबसे बड़ा वोट का जादू जनता के पास होता है. वो चाहे तो राजा को रंक बना दे, और रंक को राजा.  लेकिन अक्सर वो जादू या तो जाति में उलझ जाता है, या जुमलों में फंस कर रह जाता हैं. चुनावी मौसम में वादों की बारिश का आनंद वही ले सकता है जो जानता है कि ये बारिश नहीं, बर्फबारी है. जो ऊपर से मुलायम लगती है, लेकिन नीचे सब कुछ जमा देती है. इस बार भी चुनावी मौसम आया है. वादों की बौछार शुरू है. छाता मत निकालिए, नज़रें तेज कीजिए.  क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत वादों को परखने में है, न कि  उनमें भीगने में. तो चुनावी मौसम का आंनद लीजिए और मस्त रहिए.

Tuesday, November 4, 2025

अत्यंत अद्भुत गुणकारी है चुनावी मौसम में श्री सत्ता नारायण भगवान की कथा ✍️धर्मेंद्र कुमार


जब-जब लोकतंत्र संकट में आता है, तब-तब श्री सत्ता नारायण भगवान अवतरित होते हैं. उनका आगमन न तो पुष्पक विमान से और न ही किसी तपस्वी की तपस्या से बल्कि वे आते हैं चुनाव आयोग की घोषणा के साथ, और जाते हैं परिणाम की घोषणा के बाद. इस दौरान वे जनता के बीच चमत्कार करते हैं, वादों की वर्षा करते हैं, और हर गली-नुक्कड़ में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं.
 अवतार की लीला
श्री सत्ता नारायण भगवान के अवतार अनेक रूपों में होते हैं, कभी वे किसान के हमदर्द बनते हैं तो कभी बेरोजगारों के मसीहा. चुनावी मौसम में उनके चमत्कारों की गति इतनी तीव्र होती है कि पांच सालों की निष्क्रियता एकदम से सक्रियता में बदल जाती है. सड़कें बनती हैं, घोषणाएं होती हैं, और जनता को याद दिलाया जाता है कि "आप ही हमारे मालिक हैं" बशर्ते वोट सही बटन पर पड़े.
 प्रसाद वितरण
श्री सत्ता नारायण भगवान की कथा में प्रसाद का विशेष महत्व होता है. भक्तों को मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, और मुफ्त वादों का प्रसाद मिलता है. कुछ विशेष भक्तों को तो टिकट नामक अमृत भी मिलता है, जिससे वे स्वयं सत्ता के हिस्सेदार बन जाते हैं. इस प्रसाद की गुणवत्ता चुनाव के बाद स्वतः समाप्त हो जाती है, जैसे ही भगवान बैक टू रियलिटी मोड में लौटते हैं.
 कथा की पुनरावृत्ति
हर चुनावी मौसम में वही कथा दोहराई जाती है कि "हमने किया", "हम करेंगे", "वे निकम्मे थे", "हम महान हैं". जनता, जो इस कथा की श्रोता है, हर बार नए कथा वाचकों के माध्यम से वही पुरानी सत्ता नारायण की कथा सुनती है. फर्क बस इतना है कि इस बार कथा वाचकों की वाणी में और भी अधिक डिजिटल प्रभाव है, रिल्स, ट्वीट्स और वायरल वीडियो के रूप में.
 भक्तों की श्रद्धा
श्री सत्ता नारायण भगवान के भक्तों की श्रद्धा अडिग होती है. वे हर बार विश्वास करते हैं कि इस बार भगवान सचमुच कल्याण करेंगे. वे भूल जाते हैं कि पिछली बार भी यही कथा थी, बस कथा वाचक बदले थे. भक्तों की स्मृति इतनी क्षीण होती है कि वे पांच साल की पीड़ा को पांच मिनट के प्रवचन में भूल जाते हैं.
कथा का फलादेश
कथा का अंत हमेशा एक ही होता है, कुछ भक्त निराश होते हैं, कुछ सत्ता में शामिल हो जाते हैं, और कुछ अगले चुनाव तक फिर से तपस्या में लीन हो जाते हैं. श्री सत्ता नारायण भगवान अगली बार जब फिर अवतरित होंगे तो फिर वही कथा सुनाई जाएगी, और फिर वही प्रसाद वितरित होगा.  चुनावी मौसम में श्री सत्ता नारायण भगवान की कथा अत्यंत गुणकारी है. यह जनता को आशा देती है, नेताओं को मंच देती है, और लोकतंत्र को तमाशा बना देती है. यह कथा हर पांच साल में दोहराई जाती है, और हर बार हम इसे "नया युग" मानकर सुनते हैं. सच्चाई यही है कि श्री सत्ता नारायण भगवान की कथा का श्रवण और प्रसाद ग्रहण के बिना लोकतंत्र व जनता का कल्याण संभव ही नहीं है. इति श्री सत्ता नारायण कथा समाप्तः.

Monday, November 3, 2025

अंधभक्त बनाम चमचे: कौन है नंबर वन ? ✍️ धर्मेंद्र कुमार


 
राजनीति का मंच अब अखाड़ा बन चुका है.  जहां विचारधाराओं की कुश्ती नहीं बल्कि  वफादारी की डब्ल्यू डब्ल्यू इ (WWE) चल रही है. एक ओर अंधभक्त हैं, जो अपने नेताओं की हर बात को वेदवाक्य मानते हैं और उनके झूठे बयानों को भी सच बताने के लिए तमाम तरह के गलत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. थेथरई उनका अमोध अस्त्र है, यदि उससे भी बात नहीं बनी तो गाली गलौज व मारपीट पर उतर जाते हैं. दरअसल अंधभक्तों की शिक्षा मूलतः व्हाट्स्अप यूनिवर्सिटी से हुई है. व्हाट्स्अप यूनिवर्सिटी से तो आप वाकिफ होंगे ही. आजकल उसी का ट्रेंड है. वहीं दूसरी ओर चमचों की बिरादरी है, जो अपने नेताओं के जूते चमकाने में इतनी महारत रखते हैं कि कभी-कभी इनके नेता खुद भ्रमित हो जाता है कि वो नेता है या सेलिब्रिटी.
 तथ्यों की तिजोरी में ताले
इन दोनों वर्गों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनको तथ्यों से परहेज़ है. इतिहास की जानकारी तो इन्हें व्हाट्स्अप यूनिवर्सिटी से मिलती है, और भूगोल इनके लिए एक ट्रोल पोस्ट मात्र हैं. जब भी कोई सवाल उठता है, तो जवाब में आते हैं गूगल से प्राप्त अधकचरे आंकड़े, पुरानी क्लिपिंग्स, और भावनात्मक ब्लैकमेल पोस्ट. इन्हें अपने नेताओं के समक्ष अपनी वफादारी साबित करनी पड़ती है ताकि इनकी राजनीति की दुकान चलती रहे.
 राजनीति में 'चाटुकारिता' ही सफलता की एक मात्र कुंजी है
किसी जमाने में भारतीय राजनीति में विचारधारा, नीति और जनसेवा की बात होती थी. लेकिन अब वहां ट्रेंडिंग हैशटैग, फोटोशूट, और टीवी डिबेट की नौटंकी है. नेता अब भाषण नहीं देते, डायलॉग मारते हैं. और उनके अनुयायी भक्त और चमचे उन डायलॉग्स को आत्मसात करते हैं. यदि आप शिक्षित, ईमानदार व प्रतिभावान है लेकिन आपके पास चाटुकारिता व चमचागिरी की कोई सर्टिफिकेट नहीं है तो लाख चाहने के बावजूद आप वर्तमान राजनीति में सफल नहीं हो सकते हैं. क्योंकि वर्तमान राजनीति में चाटुकारिता व चमचागिरी ही सफलता की कुंजी है.
नंबर वन कौन ?
नंबर वन बनने के इस महामुकाबले में जीत किसी की नहीं होती. बल्कि हार होती है विवेक की, तर्क की, और लोकतंत्र की गरिमा की. लेकिन दोनों ही पक्ष अपने-अपने आकाओं की जय-जयकार में इतने व्यस्त और मस्त हैं कि उन्हें समझाना अब तर्क व तथ्यों का अपमान लगता है. जब हर बात को सही साबित करने के लिए  गलत उदाहरण दिए जाते हैं, तो कुछ देर के लिए ही सही जनता भी भ्रमित हो जाती है. लेकिन उस भ्रम में सच की हत्या हो जाती है. और जब सच मरता है, तो समाज में अंधविश्वास, घृणा, और टुकड़ों में बंटी सोच जन्म लेती है.
 जब राजनीति में भक्तों और चमचों की संख्या बढ़ती है, तो जनता सिर्फ तमाशबीन बन जाती है. लेकिन हकीकत यही है कि तमाशा देखने से बदलाव नहीं आता. बदलाव आता है सवाल पूछने से, तथ्य को जानने से, और नेताओं को जवाबदेह बनाने से. अब निर्णय आपको करना है कि सबकुछ भुलाकर कुंभकर्णी निंद्रा में पड़े रहना है या फिर समाज और देश की बेहतरी के लिए मजबूती के साथ कदम बढ़ाना है. जय हिंद

Sunday, November 2, 2025

नेता जी कहिन: नाच ना आवे, आंगन टेढ़ा ✍️ धर्मेंद्र कुमार



वर्तमान परिपेक्ष्य में भारतीय राजनीति का मंच अब सिर्फ भाषणों का नहीं बल्कि यह एक रंगमंच बन गया है, जहां नेता जी कभी भावुकता का भरतनाट्यम करते हैं, कभी वादों की कथकली, और कभी-कभी तो विरोधियों पर आरोपों की ब्रेक डांस भी कर डालते हैं. चुनावी मौसम आते ही देश के हर कोने में "नेता नृत्य महोत्सव" शुरू हो जाता है जहां टिकट फ्री और ड्रामा गारंटीड. डांस दिखाओ वोटर रिझाओ के इस महाकुंभ में फ्री में जनता का भरपूर मनोरंजन होता है.

लोकतंत्र में नाच के प्रकार 

वैसे तो भारतीय शास्त्रीय संगीत में नृत्य का महत्वपूर्ण स्थान है. नृत्य के कई प्रकार भी हैं. लेकिन भारतीय राजनीति में नाच व नृत्य की बात ही कुछ और है. राजनीति में नाच कई प्रकार के होते हैं, जिनका कोई शास्त्रीय वर्गीकरण तो नहीं हैं. लेकिन वह जनभावनाओं में गहराई से पैठ बना चुके हैं. बात अगर राजनीति नृत्य की करें तो पहले नंबर पर वोट-लुभावन तांडव नृत्य आता है.  इसमें नेता जी विकास की ऐसी झड़ी लगाते हैं कि जनता को लगता है, बस अब रामराज्य आने ही वाला है. सड़क, बिजली, पानी सब वादों की ताल पर थिरकते हैं. वहीं दूसरा नंबर आरोप-प्रत्यारोप गरबा का है. इसमें एक पार्टी आरोप लगाती है, दूसरी उसका जवाब देती है, फिर दोनों मिलकर मीडिया के कैमरे के सामने ऐसा गरबा करते हैं कि टीआरपी की घंटी बज उठती है. तीसरा नंबर दल-बदल भांगड़ा का है. चुनाव से पहले नेता जी जिस पार्टी में होते हैं, चुनावी हवा बदलते ही दूसरे दल में कूद पड़ते हैं. यह नाच बिना संगीत के होता है, लेकिन ताल हमेशा सत्ता की होती है. वहीं जब कोई नेता अपने पुराने बयानों से पलटी मारता है, तो वह संविधान की व्याख्या करते हुए संविधानिक कथक करता है तो कुछ देर के लिए ही सही जनता भी भ्रमित हो जाती है.

 टेढ़ा आंगन या नाच नकली?
नेता जी कहते हैं कि "हम तो सच्चे हैं, नाचना नहीं आता, आंगन ही टेढ़ा है." लेकिन जनता जानती है कि यह आंगन टेढ़ा नहीं, तेजाबी है, जहां हर कदम फिसलन भरा है. हकिकत यह है कि नाचने वाले को पता है कि कैमरा कहां है, तालियां कब बजेंगी, और कब मंच से उतरकर फिर से जनता के बीच "सेवा" का अभिनय करना है, कब आंसू बहाना है और कब गीत गुनगुनाना है.
 नाच का नया रंगमंच
सोशल मीडिया के इस दौर में अब तो नेता जी का हर स्टेप वायरल होता है. कोई मंच पर गाना गा रहा है, कोई डांस कर रहा है, कोई बच्चों को गोद में उठाकर वोट मांग रहा है. जनता भी कम नहीं मीम्स, रील्स और व्यंग्यात्मक ट्वीट्स व कमेंट्स की बौछार से नेता जी का "नाच" ट्रेंडिंग में बना रहता है. राजनीति का यह नाच कभी-कभी मनोरंजन देता है, तो  कभी चिंता भी. लेकिन जब जनता सजग होती है, तब यह नाच एक जन-जागरण बन जाता है. नेता जी चाहे जितना भी कहें  "नाच ना आवे, आंगन टेढ़ा." जनता सब जानती है कि  नेताओं को नाच भी आता है, और आंगन भी सीधा है, बस उनकी नीयत ही टेढ़ी है.