भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त उसकी विविधता और जनभागीदारी है, लेकिन हाल की कुछ घटनाएओं से स्वतः यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र में संविधान से इतर तानाशाही तंत्र की एक नई और चिंताजनक अध्याय की शुरुआत हो चुकी है ? भारतीय संविधान में जाति धर्म अमीर और गरीब का भेद नहीं करते हुए सभी को मतदान करने का समान अधिकार दिया गया है। यही भारतीय लोकतंत्र की खुबसूरती है और मजबूती भी। 2024 के लोकसभा चुनाव में केंद्रीय चुनाव आयोग ने शतप्रतिशत मतदान के लिए अभियान चलाया था। जिसके तहत जो वोटर मतदान केंद्रों तक जाने में असमर्थ थे, उनके घर जा कर वोट कास्ट कराया गया था। आयोग का यह प्रयास था कि एक भी मतदाता ना छुटे, लेकिन भाजपा के अमृतकाल में हालात बदल गए हैं। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के शुद्धिकरण के नाम पर अपने हिसाब से मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए एवं जोड़े जा रहे हैं। अब लाखों लोग यदि वोट देने से वंचित रह जाएं, तब भी यह चुनाव आयोग के लिए कोई चिंता का विषय नहीं है क्योंकि यह सब उनका ही कुकृत है। जबकि लोकतंत्र का तकाजा है कि एक भी वोटर अपने मताधिकार से न चुके।
आयोग पर लगे वोट चोरी के आरोप
पिछले कुछ वर्षों में विपक्ष द्वारा चुनाव आयोग पर वोट चोरी और मतदाता सूची में हेरफेर जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया के नाम पर लाखों मतदाताओं के नाम काटे। विपक्ष का आरोप है कि समर्थक वर्ग के नाम जोड़े गए, जबकि विरोधी मतदाताओं को वंचित किया गया। इसके प्रमाण भी प्रस्तुत किए गए। लेकिन आयोग ने इन आरोपों के जांच कराने के उलट, इसका जवाब देना भी उचित नहीं समझा, जो कहीं ना कहीं आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता हैं। इन घटनाओं पर न्यायपालिका की मौन स्वीकृति भी लोकतंत्र की निष्पक्षता पर गहरी चोट करती है।
संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका
संविधान का मूल आधार है कि संवैधानिक संस्थाएं स्वतंत्र और निष्पक्ष रहें। लेकिन जब उच्चतम न्यायालय गंभीर आरोपों पर ठोस कार्रवाई नहीं करता, जब संवैधानिक संस्थाएं केंद्र सरकार के दबाव में कार्य करती हैं, तो यह लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करता है। चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं जिन पर निष्पक्ष चुनाव कराने की बड़ी जिम्मेवारी है। जब उसके द्वारा जनमानस की अपनेक्षाओं की अवहेलना कर एक पक्षीय कार्य किए जाते है। तब देश की जनता का भरोसा आयोग से उठ जाता है। जो लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है।
हाल की घटनाएं
बिहार में हुए विवादित घटनाक्रम के बाद अब बंगाल में भी वही खेल दोहराया गया। इससे लोगों में यह धारणा मजबूत होती है कि केंद्र सरकार जब चाहे, जहां चाहे संवैधानिक संस्थाओं के आसरे चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र को संविधान विरोधी दिशा में ले जाती है।
एक देश, एक विधान, एक निशान ?
यह इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि भारतीय जनता पार्टी की मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के संस्थापकों ने भारतीय संविधान औऱ भारतीय तिरंगा को मानने से इंकार कर दिया था। आजादी के बाद पांच दशकों तक आरएसएस के मुख्यालय पर तिरंगा नहीं फहरा गया। तब एक देश एक विधान एक निशान और एक संगठन के पैरवीकारो की मंशा भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की थी, जिसमें वो सफल नहीं हो पाए थे। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव में धांधली से संबंथित हाल की कुछ घटनाएं उसी अघोषित लक्ष्य की प्राप्ति की ओऱ बढ़ाया गया यह कदम है। यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि इससे संघीय ढांचा और राज्यों की स्वायत्तता कमजोर होगी और तानाशाही हावी होगी।
भारतीय लोकतंत्र में शुरू हुए तानाशाही तंत्र का यह नया अध्याय जहां जनतंत्र को कमजोर करेगा, वहीं यह इसके लिए घातक भी है। बड़ा सवाल यही है कि क्या लोकतंत्र अब जनता की शक्ति से नहीं, बल्कि सत्ता की रणनीति से संचालित होगा? यदि ऐसा है, तो यह नया अध्याय लोकतंत्र के अंत की प्रस्तावना होगा।
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