सत्ता का अंत, हिंसा का सिलसिला जारी
बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की प्रचंड जीत ने 15 वर्षों के टीएमसी शासन का पटाक्षेप कर दिया। लेकिन चुनावी नतीजों के बाद जो दृश्य सामने आ रहे हैं, वे बंगाल की राजनीति की पुरानी बीमारी को उजागर करते हैं। बदले की भावना से टीएमसी कार्यालयों पर हमले एवं कार्यकर्ताओं की पिटाई तो कहीं बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्याएं। यह राजनीतिक प्रतिशोध की घटनाएं यह दिखाती हैं कि बंगाल में सत्ता बदलने से हिंसा का चरित्र नहीं बदला।
झंडा बदला, संस्कृति नहीं
टीएमसी के कार्यकर्ता जो कल तक सत्ता के संरक्षण में थे, ऐसा प्रतित हो रहा है कि आज वही लोग नए झंडे के नीचे खड़े हैं। बंगाल की राजनीति में “डंडा और गुंडा” संस्कृति इतनी गहरी जड़ें जमा चुकी है कि केवल चुनावी परिणाम इसे मिटा नहीं सकते। सवाल यह है कि क्या बीजेपी इस हिंसक राजनीतिक संस्कृति को बदल पाएगी, या वही सिलसिला नए रंग में भी जारी रहेगा।
केंद्रीय बलों की मौजूदगी और सवाल
चुनाव के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने मतदान को अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण बनाया। लेकिन चुनाव बाद की हिंसा यह बताती है कि सुरक्षा बल केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित रहे। लोकतंत्र की असली परीक्षा तो चुनाव के बाद होती है, जब सत्ता परिवर्तन के बावजूद नागरिकों को सुरक्षा और न्याय का भरोसा मिलना चाहिए।
बंगाल की राजनीति का असली संकट
बंगाल का संकट केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति का है। यहां राजनीति लंबे समय से हिंसा, डर और प्रतिशोध पर टिकी रही है। चाहे कांग्रेस हो, वामपंथी हों, टीएमसी या अब बीजेपी हर दौर में कार्यकर्ताओं और आम जनता ने हिंसा का सामना किया है। बंगाल की जनता ने टीएमसी की गुंडागर्दी से छुटकारा पाने के लिए भाजपा को समर्थन किया। लेकिन हिंसा थम नहीं रहा है। यही कारण है कि जनता पूछ रही है: “क्या बदलेगा बंगाल?”
बदलाव की राह
गृहमंत्री को केंद्रीय सुरक्षा बलों को यह स्पष्ट निर्देश देना चाहिए कि हिंसा करने वाले चाहे किसी भी दल से हों उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करें। जीत के बाद तमाम गिले शिकवे को भुला कर प्रदेश में शांतिपूर्ण वातावरण बनाने का प्रयास होना चाहिए। विपक्ष को दुश्मन नहीं बल्कि लोकतंत्र का हिस्सा मानने की संस्कृति विकसित करनी होगी। विकास, रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दों पर ध्यान देकर ही जनता का विश्वास जीता जा सकता है।
बंगाल में झंडा बदलना आसान था, लेकिन डंडा और गुंडा संस्कृति को बदलना कठिन है। अगर बीजेपी सचमुच बदलाव का दावा करती है, तो उसे हिंसा की इस परंपरा को तोड़ना होगा। अन्यथा बंगाल की राजनीति केवल रंग बदलती रहेगी, चरित्र नहीं। बंगाल का असली पुनर्जागरण तब होगा, जब राजनीति से डर नहीं, विचार निकलेगा।
No comments:
Post a Comment