2026 के विधानसभा चुनाव में बंगाल की राजनीति ने ऐतिहासिक करवट ली, टीएमसी की करारी हार के साथ ही भाजपा की अभूतपूर्व जीत का सबसे बड़ा कारण एंटी-इनकंबेंसी नहीं बल्कि ‘एंटी-टीएमसी वेव’ था। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बंगाल की जनता ने बीजेपी को जिताने के लिए नहीं बल्कि ममता को हराने के लिए जमकर वोट किया, जिसके परिणाम स्वरुप बीजेपी की प्रचंड जीत हुई। सूत्रों की माने तो टीएमसी के सींडिकेट से बंगाल की आम जनमानस परेशान था। इसलिए बंगाल की जनता ने बीजेपी को एक विकल्प के तौर चुना। इसके साथ ही वोट शेयर में आई गिरावट, दक्षिण बंगाल के गढ़ का टूटना और 15 साल की सत्ता विरोधी लहर ने भी बखूबी अपना काम किया। वहीं चुनाव आयोग द्वारा 27 लाख लोगों को वोट देने से वंचित रखना भी कहीं ना कहीं इस चुनावी परिणाम में एक बड़ा कारक है, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता। जिसको लेकर किसी भी स्तर पर कोई चिंता और चर्चा नहीं हुई। इसके मायने क्या है? हमें इस विषय पर चितंन करने की आवश्यकता है।
आजादी के बाद पहली बार बंगाल में लहराया भगवा
आजादी के सात दशक बाद पहली बार जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जन्मस्थली बंगाल में भाजपा की पूर्ण वहुमत की सरकार बनेगी। 2015 से ही बंगाल फहत करने के मिशन में लगे बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व में अंततः 2026 इसे साकार कर दिखाया। इस मिशन को साकार करने में कई बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने अपनी कुर्बानी दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में भाजपा की इस प्रचंड जीत को उन बीजेपी के शहीद कार्यकर्ताओं को समर्पित करते हुए उनके प्रति आभार प्रकट किया. बंगाल में बीजेपी को मिली इस ऐतिहासिक जीत ने जहां बीजेपी के नेताओं एवं कार्यक्रताओं में एक नई ऊर्जा का संचार किया है। वहीं बंगाल की जनता की उम्मीदें भी भाजपा से बढ़ गई है।
ध्रुवीकरण का मंत्र काम आया
बीजेपी का हिंदु – मुस्लिम मुद्दा बंगाल में काम कर गया। बंगाल में मुस्लिमों की बढ़ती आबादी से कहीं ना कहीं बंगाल की हिंदुओं ने नाराजी थी। लेकिन ममता की डर से वे अपनी नाराजगी खुल कर प्रकट नहीं कर पा रहे थे। इस बार हिंदुओं ने खुलकर बीजेपी को समर्थन किया। तभी तो टीएमसी का सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाले हावड़ा, हुगली, दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में भाजपा ने गहरी पैठ बनाई।
वोट शेयर में गिरावट
टीएमसी के वोट शेयर में गिरावट उसकी हार की एक बड़ा कारण है। 2021 में टीएमसी का वोट शेयर था 48%, जो 2026 में घटकर 41% रह गया। यह 7% की गिरावट निर्णायक साबित हुई। भाजपा ने 25 में से 28 सीटें पलट दीं, जहां पिछली बार टीएमसी बेहद कम अंतर से जीती थी। ममता इसके लिए वोटर लिस्ट से हटे 91 लाख मतदाताओं के नाम को एक बड़ा कारण मानती है। जो कहीं ना कहीं सच भी है।
टीएमसी की हार केवल चुनावी पराजय नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के राजनीतिक व्यक्तित्व के क्षरण का संकेत है। इस हार के लिए कहीं ना कहीं ममता स्वंय दोषी है। उन्होंने जो कांटे वामपंथियों के लिए बोये थे, वही कांटे आज उनकी हार की कारण बने। जनता ने यह साफ संदेश दिया कि लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टी अगर भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और असंतोष को दूर नहीं कर पाती, तो बदलाव अपरिहार्य हो जाता है। बंगाल का भगवामय होना इस बात का प्रतीक है कि अब राजनीति भावनाओं से आगे बढ़कर शासन और विकास के ठोस मुद्दों पर केंद्रित हो रही है।
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