इस कानून के दायरे में केंद्र और राज्य सरकार के उपक्रम शामिल नहीं होंगे, लेकिन इन उपक्रमों से जुड़ी आउटसोर्स कंपनियां इसके दायरे में रखी गई हैं। यह दस या दस से अधिक व्यक्तियों का नियोजन करने वाली उन संस्थाओं पर भी लागू होगा, जिन्हें समय-समय पर सरकार की ओर से अधिसूचित किया जाता है।
प्रवर समिति ने यह प्रावधान भी किया है कि जिन कंपनियों को स्थापित करने के कारण विस्थापित हुए और संबंधित जिले के स्थानीय उम्मीदवार व समाज के सभी वर्गों के प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखना होगा। लेकिन, इसका लाभ तभी मिलेगा जब उम्मीदवार पोर्टल पर खुद को पंजीकृत कर लेगा।
इस कानून का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए सक्षम प्राधिकारी की अध्यक्षता में जिला स्तर पर एक जांच समिति गठित होगी। जिसके सदस्य संबंधित संस्था, उस स्थान के स्थानीय निकाय या नामित प्रतिनिधि, डीडीसी, संबंधित मंडल के अंचलाधिकारी, श्रम अधीक्षक और जिला नियोजन पदाधिकारी होंगे। समिति की रिपोर्ट के आधार पर सक्षम प्राधिकारी कंपनी के दावे को स्वीकृत या खारीज कर सकेगा। इससे संबंधित आदेश को कंपनी 60 दिन के अंदर अपीलीय प्राधिकार के समक्ष अपील कर सकेगी। विभिन्न धाराओं का उल्लंघन करने पर कम से कम 10 हजार से पांच लाख रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकेगा। इसी प्रकार दोष साबित होने पर प्रतिदिन एक हजार से पांच हजार रुपये जुर्माना वसूलने का प्रावधान भी किया गया है।
प्रवर समिति में सभापति श्रम मंत्री सत्यानंद भोक्ता रहे। जबकि सदस्यों में विधायक रामदास सोरेन, मथुरा प्रसाद महतो, रामचंद्र चंद्रवंशी शामिल रहे। मनोनीत सदस्यों के रूप में विधायक विनोद कुमार सिंह और प्रदीप यादव को रखा गया।
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