पिछले 7 वर्षों में निश्चित रूप से इनकी संख्या में इजाफा हुआ है।लेकिन जिला प्रशासन के पास इनसे संबंधित कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं है और जिला प्रशासन के पास इनके लिए कोई स्कीम भी नही है। जिससे इनके जीवन में आमूल चूल परिवर्तन हो सके। इनके पास न तो आधार कार्ड है,ना वोटर आई डी मतलब ये बेनामी संपत्ति की तरह बिना पहचान के फुटपाथ पर पैदा हो कर फुटपाथ पर ही मर जाना इनकी नियति बन गई। वैश्विक महामारी के दौरान जब पूरा देश बेहाल था तब भी फुटपाथ पर कचरा चुनकर गुजर बसर करने वाले इन लोगो की किसी ने कोई खोज खबर नही ली। कोरोना की दूसरी लहर ने जिस प्रकार तबाही मचाई उस तबाही के मंजर को भुलाया नही जा सकता।अब जबकि वैज्ञानिकों का मानना है की कोरोना की तीसरी लहर जो और भयावह हो सकता है।ऐसे में फुटपाथ पर रहने वाले इन लोगो के लिय विशेष टीकाकरण अभियान चलाने की मांग बाल मजदूर मुक्ति सेवा संस्थान के संयोजक सदन ठाकुर ने उपायुक्त सह जिलाधिकारी से की है।बकौल ठाकुर ने जिला प्रशासन को यह जानकारी दी है की फुटपाथ पर रहने वालो इन गुलगुलिया समुदाय के लिए 2016 में इन लोगों का आधार कार्ड बनवाने के लिए पहल किया गया था जिला प्रशासन द्वारा उन्हें आश्वस्त भी किया गया था लेकिन अब तक इन लोगो का आधार कार्ड नहीं बन पाया जिसके कारण ये लोग टीकाकरण के लिए अपना निबंधन करा पाने में असमर्थ है जिसके उन्हे सरकार दौरा उपलब्ध कराया जा रहा टीकाकरण अभियान का लाभ नहीं मिल पा रहा है।श्री ठाकुर ने जिला प्रशासन से सवाल पूछा है की।फुटपाथ पर गुजर बसर करने वालो का कोई मौलिक अधिकार नहीं क्या इनके प्रति जिला प्रशासन का कोई जिम्मेवारी नही ? यह कुछ ऐसे सवाल है जिनका ज़बाब जिला प्रशासन को ही देना होगा। एक तरफ तो सरकार समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने का दावा करती है वहीं दूसरी तरफ हकीकत यह है की कचरा चुनकर फुटपाथ पर गुजर बसर करने वालो को कोविड का टीका मयस्सर नहीं । ऐसे में कुमार दुष्यंत का एक शेर यहां प्रासंगिक जान पड़ता है की
कहां तो तय था चरागा हर घर के लिए।
यहां तो एक चिराग भी मयस्सर नहीं पूरे शहर के लिए।।
No comments:
Post a Comment