Wednesday, May 26, 2021

आंदोलन के 6 महीने पूरे होने पर, किसानों ने देश भर में मनाया काला दिवस।

दोस्तों नमस्कार
कोरोना के संक्रमण के दौर में मेरा आप सबों से निवेदन है कि आप अनावश्यक भीड़ में जाने से बचें। मास्क और सैनेटाइजर का प्रयोग करें स्वस्थ रहें मस्त रहें।

किसान संगठनों का संयुक्त मोर्चा द्वारा पूर्व में किए गए घोषणा के तहत तीन कृषि कानून के खिलाफ सेम 6 महीने अर्थात 180 दिन पूरे होने पर आज देश भर में किसानों द्वारा काला दिवस मनाया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि 26 नवंबर 2020 से किसान संगठनों द्वारा दिल्ली के टिकरी सिंधु गाजीपुर बॉर्डर पर तीन कृषि कानून को वापस लेने और न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए कानून बनाने के पक्ष में सरकार के विरुद्ध आंदोलन जारी है। इस काम में किसान संगठनों और केंद्र सरकार के बीच 11 दौर की वार्ता हुई जो बेनतीजा रही। सुप्रीम कोर्ट मैं इस मामले में दखल देते हुए 4 सदस्यीय कमिटी भी बनाई। 22 जनवरी 2021 को किसान नेता और सरकार के बीच एक 11वीं और अंतिम दौर की बात हुई। बजट सत्र से पूर्व सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि किसान नेताओं से बातचीत बस एक फोन कॉल की दूरी है लेकिन आंदोलन के 6 माह बीतने के बाद भी वह एक फोन कॉल की दूरी को तय नहीं किया जा सका। कोरोना के दूसरे लहर से जब पूरा देश त्राहिमाम कर रहा है ऐसे कठिन परिस्थितियों में भी किसान दिल्ली के बॉर्डर पर आंदोलनरत है। किसान संयुक्त मोर्चा द्वारा पूर्व में दिल्ली बॉर्डर पर पी काला दिवस मनाने का आह्वान किसानों से किया गया था लेकिन कोरोना के बढ़ते संख्याओं को देखते हुए बाद में यह निर्णय लिया गया की जो किसान जहां पर है वहीं पर अपने घरों पर ट्रैक्टरों पर काला झंडा लगाकर सरकार का विरोध करते हुए काला दिवस मनाए। इसकी घोषणा 2 दिन पूर्व किसान नेता राकेश टिकैत द्वारा किया गया था।
आपको बता दें कि केंद्र सरका द्वारा लाए गए तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ 26 नवंबर 2020 से दिल्ली की सीमा पर किसानों का आंदोलन शुरू हुआ था। पंजाब और हरियाणा के बाद उत्तर प्रदेश के किसानों के सीमाओं पर पहुंचने के बाद आंदोलन ने शुरुआती दौर में रफ्तार पकड़ ली थी। आंदोलनकारी किसानों को तितर-बितर करने के लिए 27 नवंबर को सिंघु बॉर्डर पर आंसू गैस के गोले छोड़ गए, लेकिन विरोध के स्वर और तेज होने लगे। वहीं 27 नवंबर को जब भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत और नरेश टिकैत की अगुवाई में उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में किसान गाजीपुर बॉर्डर पहुंचे आंदोलन और मजबूत हो गया। देखते देखते इस आंदोलन से तमाम किसान संगठन भी जुड़ते चले गए। दिल्ली सीमाओं पर हजारों की संख्या में किसानों की मौजूदगी ने केंद्र सरकार को किसानों से बातचीत करने के लिए मजबूर कर दिया और आखिरकार एक दिसंबर को केंद्र सरकार ने किसानों को पहले दौर की बातचीत के लिए बुलाया, जो बेनतीजा रही। केंद्र सरकार के साथ एक ग्यारह दौर की वार्ता 22 जनवरी 2021 को असफल रहने के बाद किसान संगठनों ने 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर रैली निकालने की घोषणा की। गणतंत्र दिवस के अवसर पर किसानों ने ट्रैक्टर ट्रॉली पर आकर दिल्ली में प्रदर्शन के रैलियां निकाली इन सबके बीच कुछ उपद्रवी भक्तों द्वारा लाल किले के प्राचीर पर धार्मिक झंडा भी लहराया गया, जिसको लेकर कई मामले दर्ज हुए सैकड़ों किसानों के गिरफ्तारी भी हुई। कुछ समय के लिए तो लगा कि आंदोलन समाप्त हो जाएगा लेकिन राकेश टिकैत के भावनात्मक भाषण से यह आंदोलन पहले से और तेज हो गया।इस आंदोलन के समर्थन में गांवों में महापंचायतें हुई। इस आंदोलन को राजस्थान मध्य प्रदेश बिहार उत्तर प्रदेश बंगाल और दक्षिण राज्यों के किसान संगठनों का भी समर्थन प्राप्त होने लगा। वहीं विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी तीन कृषि कानून के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन को अपना नैतिक समर्थन देने का ऐलान किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस किसान आंदोलन को लोगों का समर्थन मिल रहा था। अंतरराष्ट्रीय स्तर की नामचीन हस्तियों ने किसान आंदोलन के समर्थन में विभिन्न सोशल मीडिया के माध्यम से अपने बयान दिए। सुप्रीम कोर्ट ने बातचीत से समाधान निकालने के लिए चार सदस्यीय कमेटी बनाई थी जिससे किसान नेता भूपिंदर सिंह मान ने इससे खुद को अलग कर लिया था
। इस तरह से कमेटी में कृषि विशेषज्ञ अशोक गुलाटी, डॉ. प्रमोद कुमार जोशी और अनिल धनवत शामिल रहे।
तीन सदस्यीय कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को मार्च 2021 बंद लिफाफे में जमा कर दी है। कमेटी ने इस मामले का हल निकालने के लिए करीब 85 किसान संगठनों से बात की है, जो अब सुप्रीम कोर्ट के पास है। कोरोना संक्रमण के चलते इस मामले की सुनवाई नहीं हो सकी है। कोरोना के बढ़ते संक्रमण के बीच आज भी दिल्ली की सीमाओं पर किसान बैठे हुए हैं और आंदोलन के 6 महीने पूरे होने पर आज पूरे देश में काला दिवस मना रहे हैं। अब यह देखना होगा कि केंद्र सरकार किसानों से पुनः वार्ता करने के लिए पहल करती है
 या किसानों को उनके हाल पर ही छोड़ देती है।


 

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